Tuesday, 13 June 2017

न इंतिज़ार न ख़्वाब न ही कोई उम्मीद बची है

इंतिज़ार ख़्वाब ही कोई उम्मीद बची है
यूँ लगे ज़िंदगी बस चलने के लिए चल रही है

इश्क़ से पूछो इंतिज़ार में कैसे दिन बिताए  
वक़्त के साये से उसकी कैसी कैसी बंदगी है

परदेशी लौट के कब वापस आयें हैं
इंतज़ार फिर भी दीवानों की दीवानगी है

एक पैग़ाम वक़्त भी साथ लाया है
उम्र इंतज़ार के बंधनों में नहीं बंधी है

ख़ुद को ये सच भी समझना होगा
इंतज़ार बेबसों की एक बेबसी है


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