Wednesday, 23 August 2017

कोई देख कर भी न देखना चाहे तो कोई क्या करे

कोई देख कर भी न देखना चाहे तो कोई क्या करे
टूटे आइने से गर वो घर सजायें तो कोई क्या करे

ख़ुद ही आग लगा वो आग बुझाने आये
ऐसे इंसानों की दवा करे तो कोई क्या करे

ज़िंदगी से था वादा इसे आजमाने का
वक्त साथ छोड़ जाये तो कोई क्या करे

रूठों को मनाना मुश्किल है ना मुमकिन नहीं 
पर कोई यूँ ही दूर बैठ जाए तो कोई क्या करे

मालूम है जहर पीने से मौत आएगी
कोई प्यार से इसे पिलाये तो कोई क्या करे

प्यास है जिन्हें पत्थर को भी पी जाने की
उनकी राहों पे सितम ढाये तो कोई क्या करे


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