Friday, 11 August 2017

चाँद-तारे गर अंधेरों से डर गए होते

चाँद-तारे गर अंधेरों से डर गए होते 
तो वो भी धरती पर उतर गए होते 

कुछ यादों में ही तो ज़िंदगानी हैं 
वर्ना हम तो कब के मर गए होते 

वो सब्ज रंग वो खुशनुमा फ़िज़ा लौटती नहीं 
गर बरसात ज़िन्दगी के भी  गुज़र गए होते 

एक मज़बूरी है घर वापस जाना 
वार्ना हम भी सफर में चल गए होते

बस उस दो कदम के फासले  से 
कितने दुश्मन दोस्त में बदल गए होते 

ऐन वक्त पर हमने खुद को रोका 
वार्ना हम खुद की नज़रों से उतर गए होते   





No comments:

Post a Comment