शम्मा की तक़दीर में जूझना है तो खुदा भी क्या करे
वक़्त के साथ गर मिटना है तो दुआ भी क्या करे
किस बात का डर जो वो फिर पीछे मुड़ गए
इरादा ख़ुद का टूटा हो तो हौसला भी क्या करे
इंसानों की ये दुनिया सजाई है ऊपर वाले ने
इंसान गर इसे न अपनाये तो खुदा भी क्या करे
सुराही ने लो फिर गर्दन झुका दी प्यालों पे
जाम फिर छलक जाए तो साक़ी भी क्या करे
क्या क़ाबा क्या काशी क्या पीर क्या फ़क़ीर
जब रब ही रूठा हो तो इबादत भी क्या करे
चाहत है जिन्हें ज़िन्दगी को आजमाने की
जुल्म वक्त का उनपे असर करे तो भी क्या करे
वक़्त के साथ गर मिटना है तो दुआ भी क्या करे
किस बात का डर जो वो फिर पीछे मुड़ गए
इरादा ख़ुद का टूटा हो तो हौसला भी क्या करे
इंसानों की ये दुनिया सजाई है ऊपर वाले ने
इंसान गर इसे न अपनाये तो खुदा भी क्या करे
सुराही ने लो फिर गर्दन झुका दी प्यालों पे
जाम फिर छलक जाए तो साक़ी भी क्या करे
क्या क़ाबा क्या काशी क्या पीर क्या फ़क़ीर
जब रब ही रूठा हो तो इबादत भी क्या करे
चाहत है जिन्हें ज़िन्दगी को आजमाने की
जुल्म वक्त का उनपे असर करे तो भी क्या करे
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