Wednesday, 23 August 2017

शम्मा की तक़दीर में जूझना है तो खुदा भी क्या करे

शम्मा की तक़दीर में जूझना है तो खुदा भी क्या करे
वक़्त के साथ गर मिटना है तो दुआ भी क्या करे

किस बात का डर जो वो फिर पीछे मुड़ गए
इरादा ख़ुद का टूटा हो तो हौसला भी क्या करे

इंसानों की ये दुनिया सजाई है ऊपर वाले ने
इंसान गर इसे न अपनाये तो खुदा भी क्या करे

सुराही ने लो फिर गर्दन झुका दी प्यालों पे
जाम फिर छलक जाए तो साक़ी भी क्या करे

क्या क़ाबा क्या काशी क्या पीर क्या फ़क़ीर
जब रब ही रूठा हो तो इबादत भी क्या करे

चाहत है जिन्हें ज़िन्दगी को आजमाने की
जुल्म वक्त का उनपे असर करे तो भी क्या करे




No comments:

Post a Comment