Wednesday, 23 August 2017

ग़ैरों के नजदीक अपनों से यूँ दूर जा बैठे हो

ग़ैरों के नजदीक अपनों से यूँ दूर जा बैठे हो
महफ़िल आपकी है पर आदमी आप कैसे हो

मुद्दतों बाद आज वो सामने आये हैं 
वही मंसब-ए-दिलबरी की आप कैसे हो

वो शहर बहुत पहले मिट चुका है
लगता है आप ख्यालों के घर में रहते हो

हम आज भी अदब से मिले हैं
बदले हालात में क्यों बहते हो

कुछ दुनियादारी भी सीखिये जनाब
अपनी ही रिवायतों में क्यूँ बहते हो


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