ग़ैरों के नजदीक अपनों से यूँ दूर जा बैठे हो
महफ़िल आपकी है पर आदमी आप कैसे हो
मुद्दतों बाद आज वो सामने आये हैं
वही मंसब-ए-दिलबरी की आप कैसे हो
वो शहर बहुत पहले मिट चुका है
लगता है आप ख्यालों के घर में रहते हो
हम आज भी अदब से मिले हैं
बदले हालात में क्यों बहते हो
कुछ दुनियादारी भी सीखिये जनाब
अपनी ही रिवायतों में क्यूँ बहते हो
महफ़िल आपकी है पर आदमी आप कैसे हो
मुद्दतों बाद आज वो सामने आये हैं
वही मंसब-ए-दिलबरी की आप कैसे हो
वो शहर बहुत पहले मिट चुका है
लगता है आप ख्यालों के घर में रहते हो
हम आज भी अदब से मिले हैं
बदले हालात में क्यों बहते हो
कुछ दुनियादारी भी सीखिये जनाब
अपनी ही रिवायतों में क्यूँ बहते हो
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