हमेशा कोशिश रहती है कि सुबह उठ कर एक घंटे पार्क हो आऊँ। चाहती हूँ ये मेरी आदत पूरी तरह से बन जाए। सोचती
हूँ तो लगता है इस शरीर से हम कितना काम लेते हैं तो इस शरीर के लिए भी कुछ कर ही
लेना चाहिए। हर चीज़, हर काम, इस शरीर को ले कर ही तो है। तो क्या चौबीस घंटे में
से एक घंटा इस शरीर को नहीं दे सकते? पर आदत आज भी पूरी तरह से आदत नहीं बन पाई
है। कभी छूटती है तो दो-तीन महीने के लिए छूट ही जाती है। जब सर्दियों में पता
चलता है वातावरण में प्रदूषण का स्तर बढ़ गया है तो और जाने का मन नहीं करता। आलसी
शरीर सुबह बाहर नहीं जाने के बहाने तो वैसे ही खोजता रहता है और कई बार उसे ठोस
बहाना मिल भी जाता है। सर्दी की सुबह बिस्तर छोड़ना कौन चाहता है? रोज़ी-रोटी और
काम करने की मजबूरी न हो तो बिस्तर से अच्छी कोई जगह लगती ही नहीं और सर्दियों में
तो ख़ास करके।
वैसे भी मैं सोने के
लिए बदनाम हूँ। मेरी इस सोने की आदत के कारण मेरे कई उप नाम भी पड़े हैं, कोई मुझे
कुम्भकर्ण की बहन बुलाता है, तो कोई कुछ मेहरबान हुआ तो स्लीपिंग ब्यूटी कहता है।
पर मेरे सोने के कई क़िस्से मेरे घर में आज भी बहुत ही मशहूर हैं। सब के बारे में बता
कर अपना ही स्यापा नहीं करने वाली। पर एक बता ही देती हूँ। मेरे एक अंकल सात
साल पहले मुझे सोता हुआ छोड़ कर गए थे और जब वो सात साल बाद हमारे घर आयें तो भी
मैं उन्हें सोती हुई ही मिली। अब आप लोगों को जो सोचना है सोचते रहिए।
अक्सर सुबह की सैर के
लिए घर के पास के ताऊ देवीलाल पार्क जाती हूँ। हरियाणा में ताऊ देवीलाल पार्क के
नाम से आपको बहुत पार्क मिल जाएँगे। बहुत अच्छी पहल है या थी ये सरकार की, चाहे
फ़रीदाबाद हो या गुड़गाँव या बहादुरगढ़, जहाँ मैं आजकल रह रही हूँ, सड़क के किनारे
बहुत ही बड़े-बड़े पार्क होते हैं, जिनकी चौड़ाई कई बार लम्बाई से बहुत कम होती
है, पर अपनी लम्बाई के कारण ये सुबह सैर करने वाले लोगों के प्रिय होते है। तेज़ी
तेज़ी चल कर भी आप एक कोने से दूसरे कोने पहुँचने में बीस मिनट ले ही लेते हैं और
आपके दो या तीन चक्कर के साथ सुबह की सैर पूरी हो जाती है। पहले इस पार्क में
जाने से कतराती थी, बिलकुल नैशनल हाइवे-दस के साथ लगा हुआ है। लगता था गाड़ियों और
ख़ास कर ट्रकों का प्रदूषण पार्क पर बहुत होता होगा। इसलिए घर के पास ही एक छोटे
से पार्क के दस चक्कर लगा अपने सुबह की सैर का काम निपटा लेती थी। पर बहादुरगढ़ के
ट्रैफ़िक को देखते हुए नैशनल हाइवे को बहादुरगढ़ शहर से थोड़ा मोड़ दिया गया है,
इससे कुछ वाहनो की ख़ास कर ट्रकों की कमी पार्क से सटी सड़क पर हुई है। फिर बाद
में ये भी लगा घर भी तो सड़क से बहुत दूर नहीं है, कितना ख़ुद को बचा लूँगी, घर के
सामने भी तो गाड़ियाँ चलती ही हैं। सो प्रदूषण से बचाना नहीं, शायद शरीर को ही इस
प्रदूषण से प्रतिरक्षित करना होगा (शरीर कितना प्रतिरक्षित होगा या कितना क्षतिग्रस्त
मालूम नहीं) और इस पार्क में मैं अकेले ही तो नहीं घूमने आती हूँ, लोगों की भीड़
होती है। छुट्टियों की शाम को इस पार्क की रौनक़ देखने लायक होती है, ख़ूब भीड़-भाड़
और मेले जैसा माहौल। कई बार अपने पतिदेव को बोल भी चुकी हूँ, बहादुरगढ़ का इंडिया
गेट लगता है ये देवीलाल पार्क।
ख़ैर, आज मैं अपने बारे
में नहीं बच्चों के बारे में सोच रही हूँ और उन्हीं के बारे में पूछना चाहती हूँ।
कोई छः-सात महीने पहले की बात है। एक दिन सुबह के सैर की दौरान एक महाशय पर दूर से
ही नज़र पड़ी। अगर बहुत ग़लत नहीं हूँ तो ४०-४५ की उम्र होगी, बुरी तरह चीख़े जा रहे थे,
बीच बीच में गंदी-गंदी गालियाँ भी दे रहे थे। मुड़ी तो देखा एक बच्चा एक बैट हाथ
में लिए कुछ दूर पर सहमा हुआ खड़ा था। देखते ही माजरा समझ गई। कई बार ऐसा देखा है,
बच्चों से खेलते हुए कुछ ग़लती हुई और किसी को बॉल लग गई तो बड़े उसपर टूट पड़ते
हैं। मेरा और मेरी ही तरह बहुतों की सैर चल रहा था। किसी को इस शोर से कोई फ़र्क़
नहीं पड़ रहा था। सैर करते-करते जैसे ही उस महाशय के सामने से गुज़री मन किया
इसे टोक दूँ, ये क्या तरीक़ा है बात करने का? पीछे मुड़ी और पतिदेव पर नज़र पड़ी,
नज़र पड़ते ही पतिदेव मेरी मंशा समझ गए, वो मेरी रग-रग से वाक़िफ़ हैं। सीधे घड़ी
की तरफ़ इशारा करते हुए बोल पड़े, बहुत देर हो चुकी है, आज ऑफ़िस देर से जाने का
इरादा है क्या?
घड़ी पर नज़र पड़ी तो देर हो चुकी थी, कुछ ज़्यादा ही देर। उस दिन पार्क भी
देर से ही आई थी। लगा अगर उस महाशय से उलझी तो समझाने में बहुत समय लग जाएगा, शायद
२०-२५ मिनट, उसका ग़ुस्सा देख लगा घंटा भी लग सकता है। बात शुरू करूँगी तो अंजाम
तक तो पहुँचना ही होगा, बीच में छोड़ कर तो नहीं भाग सकूँगी। ध्यान आया आज ऑफ़िस
में कुछ मेहमान भी आने वाले हैं तो ऑफ़िस समय से कुछ पहले पहुँचना भी ज़रूरी है।
कुछ इसी सब सोच के साथ उस महाशय के सामने से उसे घूरती हुई निकल गई। मेरे
घूरने का मुझे नहीं लगता उस पर कोई असर हुआ होगा। पर जब पार्क का वो भाग जहाँ ये
घटना हो रही थी मेरी आँखों के सामने से ओझल होने वाला था पीछे मुड़ी, तो देख कर
चौंक गई। वो १२-१३ साल का बच्चा उसी जगह चुपचाप वैसे ही खड़ा था, जैसे किसी स्कूल
में उसे कोई दंड मिला हो। वो महाशय तो घूमते हुए चिल्ला रहे थे पर वो बच्चा बिना
हिलेडुले उस महाशय को सर झुका कर सुन रहा था। मन किया मुड़ जाती हूँ और उस
बच्चे को समझाती हूँ, कोई बात नहीं कुछ बड़े सनकी होते हैं, बुरा मत मानना इनकी
बातों का। पर फिर समय का ध्यान आया और मैं बिना मुड़े ही घर की तरफ़ निकल पड़ी।
घर पहुँच कर ऑफ़िस के लिए तैयार हुई पर उस मासूम का चेहरा नज़र से हट ही नहीं
रहा था। वो मासूम अपराध-बोध से वहाँ वैसे खड़ा मेरी आखों में बैठ गया था। क्या
होगी उसकी उस समय की मनोदशा? लगा कितनी बड़ी बेवक़ूफ़ी कर दी, एक दिन ऑफ़िस देर से
पहुँचती तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाता। कई बार देर हो ही जाती है अपने किसी काम के
कारण, आज एक बच्चे के कारण कर लेती। वो बिचारा बड़ों की दुनिया में कितना लाचार सा
खड़ा हुआ बड़ों को सुन रहा था। उस सोच के साथ अपना बचपन भी ध्यान आ रहा था। चुप
मैं बचपन में भी नहीं रहती थी। सॉरी अंकल लग गई, जान-बूझ कर नहीं मारा है, कुछ तो
बोल ही देती थी पर वो बच्चा बिलकुल चुपचाप खड़ा था शायद इसलिए और भी बुरा लग रहा था। बच्चों के खेल के दौरान बड़ों
को कभी-कभार चोट लग भी जाती है पर बच्चों की सोचिए उन्हें कितनी चोट लगती है। पर
चोट के कारण वो खेलना कब छोड़ते हैं। साथ-साथ ख़ुद को सांत्वना भी दे ही रही थी।
कोई बात नहीं, अगर मैं नहीं बोली तो कोई तो बोला होगा। हो सकता है उसके माँ-बाप
बग़ल वाले पार्क में हों और वो आ गए हों। पर अब अपराध-बोध से मैं पूरी तरह ग्रसित हो
चुकी थी। लगा ये नहीं करना चाहिए था मुझे, चुप रहकर मैंने बहुत बड़ी ग़लती की थी।
अगले दिन कुछ जल्दी ही पार्क पहुँच गई, मेरा मन आज पार्क में कम और उस बच्चे में
ज़्यादा था। पर वक़्त आपको हर बार मौक़ा नहीं देता, बहुत देर उस बच्चे का इंतज़ार
किया। नज़रें उसे खोज कर जब पूरी तरह थक गई तो उस महाशय को ही खोजने लगी। लगा उसे
ही कुछ बोल मन शांत कर लूँगी। पर जो नहीं होना था वो नहीं हुआ और मुझे वो महाशय भी
कहीं नज़र नहीं आये, पर उस बच्चे के न मिलने से मेरी बेचैनी और बढ़ गई। लगा कि वो
बच्चा डर के कारण अब पार्क में कभी भी नहीं आयेगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि डर से वो
अब बैट ही ना पकड़े। फिर वो ही हुआ जो अक्सर होता आया है। दुनियाभर के
अजीबों-ग़रीब ख़याल, कहीं ये तो नहीं हुआ? कहीं वो तो नहीं हुआ? और मेरा ख़ुद को
कोसना चालू, कैसी बेवक़ूफ़ हूँ? जब समय था तो मौन दर्शक थी और अब लग रहा है ये कह
सकती थी, वो कह सकती थी।
कुछ दिन पहले फिर से कुछ ऐसा हुआ कि छः-सात महीने पहले की वो घटना बिलकुल
ताज़ा हो गई। सुबह के समय पार्क में घूम रही थी कि अचानक कुछ उम्रदराज़ लोगों के
एक समूह में से आवाज़ आई, इन बच्चों का पार्क में खेलना बंद कर दो, इस तरह से तो
ये किसी की जान ले लेंगे। दूसरी तरफ़ नज़र
गई, दस-बारह साल का एक बच्चा फ़ुट्बॉल के साथ खड़ा था उसके साथ एक और बच्चा भी
थोड़ी दूरी पर। दोनों कुछ डरे और सहमे हुए थे, माजरा तुरंत समझ में आ गया। पिछली
घटना ने सिखा दिया था, सो इस बार मैं चुप नहीं रहने वाली थी।
घूमने के क्रम में ही उस उम्रदराज़ लोगों के समूह के पास आ पहुँची। बिना
सम्बोधन किए ही पूछ लिया, क्या हुआ?
‘अरे ये आजकल के बच्चे कुछ देखते ही नहीं हैं। किसी की भी जान ले लेंगे। इतनी
तेज़ी से फ़ुट्बॉल पीछे से मारा कि जान भी जा सकती थी,’ समूह के एक सदस्य ने कहा।
‘ग़लती से लग गया होगा।’
‘नहीं बिटिया, इन्हें कुछ नहीं कहो तो ये बिगड़ जाते हैं। देखो पार्क की क्या
हालत है, इनका तो पार्क में खेलना बंद करवा देना चाहिए। पूरे पार्क के घास को खेल-खेल
कर ख़राब कर दिया है। ये पार्क फ़ुट्बॉल का मैदान नहीं है, यहाँ लोग घूमने आते हैं,’
उनमें से एक शख़्स ने कहा।
बिटिया, शब्द में प्यार के साथ मुझे एक सुकून भी मिला। अभी तक इस कुछ
उम्रदराज़ समूह को मैं कुछ आदर सूचक सम्बोधन नहीं दे पाई थी। किसी अनजान को
अंकल-आंटी, ताऊ-ताई से जल्दी सम्बोधित करने से बचती हूँ। पता नहीं कब किसी को
कौन-सी बात बुरी लग जाए। कई बार अजीब भी लगता है, जब किसी को किसी दूसरे को आंटी-अंकल
से सम्बोधित करते देखती हूँ, लगता है उम्र तो दोनों की एक ही जैसी दिख रही है।
अब मेरे में कुछ विश्वास और आ चुका था, सो बोल पड़ी, ‘अंकल, यहाँ नहीं खेलेंगे
तो कहाँ खेलेंगे, हमने बच्चों के खेलने की जगह छोड़ी ही कहाँ है। हर जगह रोड या
बिल्डिंग बना दिए है। बेचारे बच्चों को कुछ नहीं मिलता है तो रोड पर ही खेलते हैं
और हम लोगों ने वहाँ पर भी बंदिश लगा दी है। हर कोई इन्हें वहाँ से भी भगा ही रहा
है। भागो यहाँ से, यहाँ नहीं खेलना है।
कितना सुंदर है ये पार्क और मुझे ये पार्क इसलिए और ज़्यादा पसंद है कि यहाँ
किसी बात की मनाही नहीं है। मुझे वो पार्क बिलकुल अच्छे नहीं लगते जहाँ बहुत रोक-टोक
होती है। घास से तो पार्क भर देते हैं पर घास सिर्फ़ आँखों के लिए होती है। किसी
को घास के ऊपर चलने नहीं दिया जाता, बच्चों को खेलने नहीं दिया जाता, कभी बच्चे
ग़लती से चढ़ भी गए तो गॉर्ड इतनी बुरी तरह चिल्लाता है बच्चों पर। दिल्ली में भरे
हुए हैं ऐसे पार्क, पर किस काम के? मालूम है बहुत अधिक इस्तमाल से ख़राब हो सकते
हैं, पर इस्तमाल ही ना हो ताकि सुंदर दिखे? कम से कम बच्चों को तो आज़ादी होनी
चाहिए, हम उन्हें समझा सकते हैं ख़राब न करे, पर ख़राब होने के डर से खेले भी ना?
ये तो ग़लत बात है।
आठ-दस लोगों का ये समूह ध्यान से अब मेरी बात सुन रहा था, ‘घास तो गरमी के
कारण कुछ ख़राब हुई है। कितनी अच्छी व्यवस्था है न, इस पार्क की एक हिस्से को पानी
से भर देते हैं और फिर दूसरे हिस्से को लोगों के लिए छोड़ देते हैं और फिर कुछ दिन
बाद दूसरे हिस्से में पानी भर देते हैं ताकि लोग पहले में घूम सके, इससे पार्क भी देखिए
कितना मेंटेंड (संधृत) है।
लगा अब जैसे पूरे समूह की मेरी बातों से सहमति है और इसी मौक़े का फ़ायदा
उठाया जाए। नज़र उस बच्चे पे भी लगातार थी, जो अभी भी सहमा हुआ हम सब को देख रहा
था। पर मैं उसे देख लगातार बीच-बीच में मुस्कुरा रही थी। बात करते-करते हम सब
धीरे-धीरे चल भी रहे थे और जान बूझ कर मैं उस बच्चें की तरफ़ ही जा रही थी, जब
बच्चे के कुछ क़रीब पहुँच गई तो सब के साथ खड़ी-खड़ी ही बोल पड़ी।
‘अरे आपने अंकल लोगों को सॉरी नहीं बोला। माफ़ी माँगनी चाहिए न ग़लती से ही
सही, पर आपकी बॉल इनको लग गई और इन्हें
दर्द भी हो रहा है। बड़ों को चोट अधिक लगती है। पर खेलना मत छोड़ना वैसे भी हमारा
देश फ़ुट्फ़ॉल में फिसड्डी है, तुम भी नहीं खेलोगे तो हम तो कहीं के नहीं रहेंगे,’
मेरी बात सुन कर सब हंस दिए और वो बच्चा और उसका साथी भी कुछ मुस्कुरा दिया।
इशारा दे कर मैंने उसे बच्चे को अपने पास बुलाया और वो आ भी गया। बच्चे ने
मेरी बात सुनी और धीरे से ही सही, सबको सॉरी बोला पर अभी भी मुझे वो कुछ सहमा ही
लगा। बच्चे को सामान्य करने के लिए बोल पड़ी, अपना राउंड ख़त्म कर के आती हूँ।
खेलने दोगे ना मुझे? बच्चे ने मुस्कुरा कर सर हिला दिया।
कहाँ मैं पिछली बार अपने मौन के बाद सोच रही थी, ये बोलूँगी तो ये सुनूँगी,
फिर मैं ये बोलूँगी। मेरी बोतों का विरोध करना तो दूर, लोगों ने असहमति भी नहीं
ज़ाहिर की। किसी ने मेरी एक बात को भी नहीं काटा, टोका भी नहीं। सब मेरी बातों को
सुन रहे थे और वो भी शायद ध्यान से। लगा जब सब मान गए हैं वो भी आसानी से तो और
प्रवचन देना ज़रूरी नहीं हैं। सबसे विदा लेने के लिए बोल पड़ी, ‘अच्छा अब चलती हूँ
मेरा राउंड तो अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ है।’
जवाब में एक बुज़ुर्ग बोल पड़े, ‘हाँ आपको हम देखते हैं इस पार्क में सबसे
तेज़ आप ही चक्कर काटते हो।’
‘अच्छा। मैंने तो ध्यान ही नहीं दिया इस बात पर।’
‘पर कई महीनों से आप दिखे नहीं।’
‘हाँ, आज कई महीनो बाद आई हूँ। सर्दियों में सुबह आना नहीं होता था और फिर आदत
छूट गई तो सुबह नींद ही नहीं खुलती है। पर आज से फिर शुरू कर दिया है। कोशिश
करूँगी न छूटे।’
‘अच्छी आदत है मत छोड़ना।’
‘बिलकुल’ कह कर मैंने अपनी चाल पकड़ ली।
धड़ी पर नज़र पड़ी तो देखा, पार्क में आये पूरे पंद्रह मिनट हो चुके थे। मतलब
इस घटना-क्रम में लगभग १० मिनट ही लगे होंगे और मैं इतने समय के लिए पिछली बार चूक
गई थी। पर एक ख़ुशी भी थी कि इस बार नहीं चूकी।
कुछ देर घूमने के बाद दोनों बच्चों के पास पहुँच गई। बोली, चलो खेलती हूँ।
बुज़ुर्गों द्वारा मेरी तारीफ़ बस कुछ देर तक ही टिक पाई। पार्क में सबसे तेज़
चलने वाली मैं इन १०-१२ साल के बच्चों का साथ दो मिनट भी नहीं दे पाई। कभी वॉलीबॉल
और कबड्डी की स्कूल की अच्छी खिलाड़ी थी। ये दोनों खेल बहुत खेला था और कबड्डी में
तो केंद्रीय विद्यालय नैशनल तक खेली हूँ, जो कि किसी स्कूल के लिए आज भी बहुत बड़ी
बात है। कई केंद्रीय विद्यालय अपने स्कूल के हर साल के राष्ट्रीय स्तर पर गए
बच्चों के नाम साल के साथ स्कूल के रिसेप्शन पर लगाते हैं। लगा बच्चों की ताक़त और
शक्ति के लिए बहुत ही ज़रूरी है ये खेल।
बच्चों की तारीफ़ कर घर की तरफ़ मुड़ गई। पर घर आते हुए पूरे रास्ते ये ही ख़याल
आ रहा था, सही में कहाँ खेलने जायें ये बच्चे। कुछ दिन पहले की ही बात है, ठीक घर
के सामने सड़क पर कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। कुछ शोर सुन कर अपनी बाल्कनी में
आई तो देखा पड़ोसी उनपर चिल्ला रही थी, ‘यहाँ पर नहीं खेलोगे तुम लोग, कहीं और जा
कर खेलो।’
‘आंटी, हम कहाँ खेलें? उस रोड पर पहले खेलते थे वहाँ से सबने हटा दिया।’
‘तो पार्क में खेलो।’
‘पार्क में खेलने की जगह नहीं है और वहाँ बहुत छोटे-छोटे बच्चे हैं, लोग खेलने
को मना करते हैं।’
सामने पार्क पर नज़र कई, बहुत ही छोट-सा पार्क है और बच्चों से भरा था। वहाँ
क्रिकेट खेलना वैसे भी सम्भव नहीं था।
‘नहीं तुम यहाँ नहीं खेलोगे, हमारी खिड़की टूट चुकी है।’
‘ठीक है आंटी आज खेल लेते हैं कल से नहीं खेलेंगे।’
‘नहीं, तुम अभी भी नहीं खेलोगे, दो बार तुम्हारी बॉल हमारी बाल्कनी में आ चुकी
है।’
अब तक पड़ोसी के पतिदेव और उनके दोनों सयाने बेटे (दोनों नौकरी कर रहे हैं पर
अविवाहित हैं) भी बाल्कनी में आ चुके थे। अब पड़ोसी के पतिदेव बोल पड़े।
‘तुम्हें तो मना किया था फिर से आ गये। चलो तुरंत हटो यहाँ से।’
तभी पड़ोसी की नज़र मुझपर पड़ गई सो मैंने ही पूछ लिया, ‘आपका शीशा टूटा है
क्या?’
‘नहीं, पर दो बार बॉल घर में आ गई है। हम खाना खा रहे थे, प्लेट बस बच गई। ये
बच्चें सुनते कहाँ हैं?’
अब बच्चें भी बहस से हार चुके थे और उन्होंने अपना खेलना बंद कर दिया।
बॉल कई बार मेरी बाल्कनी में भी घुसा है। घर में होती हूँ तो बच्चे ले जाते
हैं और नहीं होती हूँ तो भी उन्हें मालूम है बॉल वापस कैसे पाना है। सो कोई न कोई
सुबह आता है, आंटी कल आपकी बाल्कनी में हमारा बॉल आया था। घर के शीशे कई बार टूटे
हैं, पर एक बार भी बच्चों के बॉल से नहीं, अपनी ग़लतियों के कारण, कई बार खिड़की बंद
करना भूल जाती हूँ और अगर तेज़ आँधी चली तो खिड़की के शीशे अंतिम साँस ले लेते
हैं।
कई बार जब ऑफ़िस से वापस आती हूँ तो पार्किंग में बच्चें खेलते हुए मिलते हैं।
चार गाड़ी की पार्किंग की जगह है, दया ही आती है बच्चों पर कि इस छोटी सी जगह पर
क्रिकेट खेल रहे हैं। गाड़ी कहीं और पार्क कर देती हूँ और बाद में जब खेल ख़त्म हो
जाता है वापस पार्किंग में लगा देती हूँ। हम बड़ों ने ज़मीन के हर हिस्से पर अपना
क़ब्ज़ा कर लिया है कहीं घर, तो कहीं सड़क, कहीं फ़ैक्टरी, पार्क में भी छोटे
बच्चों के झूले हैं पर बड़े बच्चों के खेलने के लिए बड़ी जगह ग़ायब-सी हो गई है। सड़क
पर बच्चों का खेलना वैसे भी ख़तरनाक है, गाड़ी हमेशा आती-जाती रहती है। कभी ये गिर
गये तो कंक्रीट की ज़मीन के कारण चोट बहुत ही ज़्यादा लगती है। अगर कहीं कोई
देवीलाल पार्क है भी तो हम एक गेंद के लगने से क्यूँ इतने झल्ला उठते हैं? इस देश
में खेल को वैसे भी हम भूल ही रहे हैं। बच्चों को किताबों के बोझ से हम बड़ों ने
लाद दिया है, दूसरा मोबाइल गेम (खेल), टीवी, सोशल मीडिया के आगे वैसे ही ये कम ही बाहर खेलते
हैं। पर अगर खेलना चाहें तो कहाँ? खेल के बड़े-बड़े मैदान तो स्कूलों से भी ग़ायब
हो रहे हैं। ज़मीन की कमी के कारण अब सरकार ने भी स्कूलों को मान्यता देने के लिए
ज़मीन की ज़रूरतों को कुछ कम कर दिया गया है। स्कूल को मान्यता देने के क्रम में पिछले
१०-१५ सालों में तेज़ी से कई बदलाव भी आ गए हैं। अब तो दो स्कूल एक क्रीड़ा स्थल
दिखा कर मान्यता हासिल कर रहे हैं।
क्या ये बच्चों पर अन्याय नहीं हैं? सोच कर देखिए, सचिन तेंदुलकर के खिड़की
तोड़ने के क़िस्से को हम सब कितने गर्व से सुनाते और सुनते हैं पर एक बॉल अपनी
बाल्कनी में बर्दाश्त नहीं कर पाते।
लगता है सब बच्चों को इकट्ठा कर के एक मुहिम चलाया जाए, हमें अपने खेलने का
जगह दीजिए, नहीं तो बताइए हम कहाँ खेलने जाए?
Good write up . I totally agree with you Madam Anita Jee . The local authorities are unable to provide the facility for the children to play . If in some park the children play , the elders & retired people admonish the kids , that the park is being spoilt .
ReplyDeleteThanks a lot Sir ji...seriously hoping we can do something for kids .. .. to being with at least we can make our surroundings aware of this problem by sensitising people to behave and take care of slightly grown up kids .. they too need space to grow
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