Sunday, 30 April 2017

आईनों को बदल बदल हम सज़ा रहे थे

आईनों को बदल बदल हम सज़ा रहे थे
हम ख़ुद के चेहरे को ख़ुद से छुपा रहे थे

आईनों के बदलने से हम भी कुछ बदलेंगे
ये उम्मीद भी हम हर बार ख़ुद से लगा रहे थे

ख़ुद का भरोसा ख़ुद से ही उठ चुका था
इसलिए हम आईने से उम्मीद लगा रहे थे

आईने को झुठलाने की कुछ उम्मीद बंध गई
ख़ुद को तो हम बहुत पहले से झुठला रहे थे

चलिए अब एक घर आईनों से ही बनाए
लोग पत्थरों से हमारे लिए घर सज़ा रहे थे





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