आईनों को बदल बदल हम
सज़ा रहे थे
हम ख़ुद के चेहरे को ख़ुद
से छुपा रहे थे
आईनों के बदलने से हम
भी कुछ बदलेंगे
ये उम्मीद भी हम हर बार
ख़ुद से लगा रहे थे
ख़ुद का भरोसा ख़ुद से ही उठ चुका था
इसलिए हम आईने से उम्मीद लगा रहे थे
आईने को झुठलाने की कुछ उम्मीद बंध गई
ख़ुद को तो हम बहुत पहले से झुठला रहे थे
चलिए अब एक घर आईनों से ही बनाए
लोग पत्थरों से हमारे लिए घर सज़ा रहे थे
No comments:
Post a Comment