पिछले कुछ दिनों से बहुत परेशान थी। कई बार बड़ी-बड़ी बातें भी असर नहीं करती और कई बार छोटी सी बात भी दिल में इस क़दर चुभ जाती है कि लाख कोशिश करते रहिए निकलने का नाम ही नहीं लेती। ख़ुद को हर तरह से समझा रही थी, हर तरह के तर्क दे चुकी थी। पर बात ज़हन से निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी और
दिमाग़ का असर शरीर पर साफ़ दिख रहा था, न भूख, न प्यास और न ही नींद। मन कर रहा
था कोई ऐसी जगह जाऊँ जहाँ कोई मुझे पहचानता न हो। क्यूँ नहीं भूल जाती ऐसा कुछ हुआ
है, हज़ारों बातें तो ज़िंदगी में होती हैं, ये भी हो गई, भूल जाऊँ; कुछ ऐसा ही हुआ
है। पर भूलना कहना जितना आसान है असल में भूलना उतना ही मुश्किल होता है।
मन बहलाने के लिए बहुत
कुछ किया। कुछ लोगों के घर कई, ऑफ़िस में भी लोगों के बीच घिरी रही। बाद में सोशल
मीडिया का सहारा लिया, पर चीज़ें ठीक होने के बदले और बिगड़ गई। सोशल मीडिया में
भी कुछ ऐसा हुआ कि दिमाग़ और बिगड़ ही गया। लगा मैंने कुछ ज़्यादा ही लोगों को भाव
दे दिया है। दिमाग़ तो ख़राब पहले से था सो लोगों को ब्लॉक भी कर दिया। आज-कल सोशल
मीडिया में लोगों को ब्लॉक करने में मुझे देर भी नहीं लगती है, आदत सी बन गई है।
किसी को भगवान का फ़ोटो अपने फ़ोटो की जगह लगा कर उलटा सीधा पोस्ट करते देख ब्लॉक
कर देती हूँ। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, अगर आपको मेरे लिखने से परेशानी है तो
अपने घर में रहो न, मैंने नहीं कहा है आपको फ़ॉलो करने को और ना ही जवाब देने को।
कोई शौक़ नहीं है हज़ारों या लाखों फ़ालोअर हों। कुछ अच्छे दोस्तों से गपशप हो जाए,
बस इतनी ही चाहत है इस सोशल मीडिया से। फिर सोशल मीडिया से भी बाहर निकल आई। पर
ब्लॉक करने की कुछ आत्मग्लानि थी। कुछ ज़्यादा ही लोगों को ब्लॉक करने लगी हूँ
आजकल!
पर ग़ुस्सा जैसे ख़त्म
हो ही नहीं रहा था। मन कर रहा था कोई ऐसी दवाई मिले जिसे खाऊँ और ग़ुस्सा ग़ायब।
पर हमारे वैज्ञानिकों ने अभी तक ऐसी कोई खोज नहीं की है सो दवाई नहीं मिली। नेट पर
ग़ुस्सा कम करने के तरीक़े खोजे पर कोई तरकीब मेरे किसी काम की नहीं थी। प्रवचन तो
मैं भी लोगों को हज़ारों दे सकती हूँ। ग़ुस्सा मत कीजिए, कोई लिखने को बोले तो शायद
पचास-सौ पन्ने आसानी से लिख दूँगी और कोई निबंध लेखन की इस विषय पे प्रतियोगिता
हो तो इनाम भी पक्का ले लूँगी, कथनी और करनी का अंतर कोई भी प्रतियोगिता कहाँ नाप पाती है।
दो-तीन दिन पहले जब
सुबह सो कर उठी तो मालूम नहीं क्यूँ स्कूल की दो घटना अचानक ही याद आ गई। अपनी
दूसरी मैम का नाम याद करना चाह रही थी। रमण दुग्गल का भी एक दिन पहले मिस्ड कॉल देर
से देखा था सो उसे कॉल-बैक भी करना था। रमण मेरे स्कूल का (केंद्रीय विद्यालय
नम्बर २ अंबाला-कैंट) सहपाठी है और अभी आर्मीऑफ़िसर है। फ़ोन पे बिना दुआ सलाम के
ही पूछ लिया।
‘रमण हमारे
ट्वेल्फ़्थ(बारहवीं) क्लास की बायो (biology-जीव विज्ञान) मैम का क्या नाम था?’
‘राधा मैम।’
‘अरे नहीं राधा मैम तो
इलेवन्थ (ग्यारहवीं) तक ही थी जब हम ट्वेल्फ़्थ क्लास में पहुचें तो उनका
ट्रान्स्फ़र (स्थानांतरण) दिल्ली के किसी स्कूल में हो गया था, कोई अड-हॉक (अस्थाई) टीचर आई थी कुछ दिनों के लिए।’
‘मुझे ठीक से याद नहीं
है, वैसे भी मैंने बायो में बस पासिंग मार्क्स लिए थे। मुझे बायो में बिलकुल इंटेरेस्ट(रुचि) नहीं था, पर मैम का नाम पता
कर के बताता हूँ।’
दो मिनट सोच कर हँसी आ
गई। दसवीं के बाद हमारी पूरी क्लास ने जीव-विज्ञान और गणित दोनों लिए थे। हमें
हिंदी, जीव-विज्ञान और गणित तीनों में से कोई दो विषय चुनने थे। याद है कि
मेरी सहेली मंजू ने तब कहा भी था, अनीता हिंदी ले लेते हैं और मैथ्स छोड़ देते
हैं। दसवीं में मैथ्स मेरा पसंदीदा विषय था और मैथ्स में डिस्टिंक्शन आए थे, सो
छोड़ने का मन नहीं किया। कहा, ‘रख लेते हैं ,देखते हैं क्या होगा। पूरी क्लास में
एक बच्चे ने भी हिंदी नहीं ली है।’
‘हाँ, हम पूरी क्लास
डॉक्टर और इंजीनियर दोनों बनने का मौक़ा नहीं खोना जो चाहते थे।’ रमण को हँसते हुए
मैंने जवाब दिया।
रमण ने पूछा, ‘आज ये
मैम तुझे क्यूँ याद आ रही है?’ उसे बताया अपनी इस परेशानी में मुझे वो दो घटना याद
आ गई थी। कैसे कभी बिना क़सूर के मैं क़सूरवार बन गई थी और कैसे राधा मैम ने मुझसे
न आता जवाब भी निकलवा लिया था। रमण से मैंने वो दोनों घटनायें भी साझा किए।
बारहवीं में
जीव-विज्ञान की प्रैक्टिकल परीक्षा के लिए मैं परीक्षा के कुछ दिन पहले ही काम में लगी। लेट-लतीफ़
हमेशा से ही रही हूँ। पेड़-पौधे के फ़्लोरा पर अपना प्रैक्टिकल मैंने मैम से बात
कर के चुना था। इसके लिए एक मीटर बाई एक मीटर की लकड़ी का फट्टा बना कर उसमें अंदर
२० सेंटिमीटर बाई २० सेंटिमीटर के २५ खाने लकड़ी के फट्टे से ही तैयार किए थे। अब इस
लकड़ी के जाल को एक अनजान जगह रह कर हर खाने के पौधे के बारे में जानकारी लेनी थी।
कई तरह के पौधे उस वातावरण के अनुसार, उस मौसम के अनुकूल मिले। किताब से खोज खोज
सबके बारे में लिखा, पर परेशानी सब पौधे को फ़ाइल में लगाने की थी। पौधे हरे थे,
स्कूल में हम सब विद्यार्थी हेरबेरिम (सुखी वनस्पति का संग्रह) बनाने में माहिर
थें, सो जानती थी इतनी जल्दी ये सूख कर फ़ाइल में लगाने लायक नहीं होंगे और हरा लगा
दिया तो पूरी फ़ाइल ही ख़राब हो जाएगी। मैम से बात करने गई कि मैम अगर ये ऐसे लगा
दिया तो फ़ाइल ख़राब हो जाएगी। बहुत मेहनत से सारी जानकारी हासिल की है, क्या करूँ?
मैम ने सुझाव दिया, इन सब पौधों के चित्र बना दो और लिख दो उनके बारे में, एक खाने
में कितने मिले, पूरे में वो कितने थे, हर एक को ठीक से गिनकर उनके छोटे छोटे विवरण
भी। मैंने बिलकुल वैसे ही किया।
प्रैक्टिकल परीक्षा के लिए हमारे इग्ज़ैमनर (परीक्षक) बाहर से आते थे जो किसी
और स्कूल के टीचर हुआ करते थे। उनका हम विद्यार्थियों से कोई सीधा परिचय नहीं
होता था। जैसे ही उन्होंने मेरी फ़ाइल देखी वो उखड़ गये,
‘ये क्या पौधों के चित्र हैं, पौधे क्यूँ नहीं लगाए?’
‘सर, वो पौधे फ़्रेश थे, फ़ाइल ख़राब हो जाती इसलिए।’
‘तो? मैं कैसे मानूँ ये आपने किया है। आपने किसी की नक़ल कर लिख लिया होगा।’
मैम भी साथ ही बैठी थी, सो मैंने भी बोल दिया, ‘मैम को मालूम है, और मैंने उनसे
पूछा था, उन्होंने भी कहा कि मत लगाओ, चित्र बना लो।’
पर मैम का जवाब सुन कर मैं हैरान हो गई, ‘नहीं, मैंने कब कहा तुम्हें।’
पहले से ही घबराई थी और उसपर से बारहवीं के बोर्ड का हौआ, बुरी तरह से मैम की
बात सुन कर डर गई। बचपन से ही रोंदूँ हूँ, छोटी-छोटी बातों पर ख़ूब रोना आता है।
किसी ने कुछ कहा नहीं कि आँसू धड़-धड़ गिरना चालू, सो मैम की बात सुनते ये आँखें क्यूँ
शांत रहती, सो इन्होंने भी अपना कारनामा दिखा दिया।
‘मुझे इन लड़कियों की यही आदत नहीं पसन्द है, एक तो ग़लती करती हैं और फिर कुछ
पूछो तो रोना चालू।’ बाहरी परीक्षक (इक्स्टर्नल इग्ज़ैमनर) ने ये बात मैम को कही,
और मैम फिर मुस्कुरा दी। मैम को मुस्कुराता देख मेरे आँसुओं ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली, अब उन्हें रुकना पसंद नहीं था।
किसी तरह से परीक्षा ख़त्म कर जब बाहर आई तो राधा मैम बहुत याद आने लगी। लगा
क्यूँ मैम बोर्ड की परीक्षा के समय हमें छोड़ कर चली गई। ग्यारहवीं कक्षा का ध्यान
आया। तब भी बाहरी परीक्षक ही आए थें और साथ में राधा मैम भी बैठी थीं, और उसने एक
ऐसा सवाल पूछा था जिसका जवाब मैं लगभग भूल-सी गई थी। कुछ परीक्षा और कुछ बाहरी
परीक्षक के कारण वैसे भी घबराई हुई थी। जब जवाब नहीं दे पा रही थी, राधा मैम ने बाहरी
परीक्षक को देखते हुए बोला, ये हमारे क्लास के होशियार बच्चों में से है, मालूम
नहीं आज कैसे नहीं बोल रही है। लगता है तुम मेटमोरफ़ोसिसि भूल गई हो।
मैम का ये विश्वास मुझमें और विश्वास दे गया और साथ में मैम का एक हिंट भी था।
अजानक पूरा जवाब ध्यान आ गया। मैम अब मुझे देख मुस्कुरा रही थी। जवाब दे कर मैं भी
ख़ुशी-ख़ुशी बाहर निकली थी।
आज सोचती हूँ तो लगता है दोनों में से कोई भी बाहरी परीक्षक मुझे नहीं जानते थे।
दोनों की नज़रों में छवि मेरी अपनी टीचर ने बनाई थी। एक ने मेरी ग़लती नहीं होते
हुए भी मुझे क़सूरवार ठहराया और एक ने न आते जवाब भी मुझसे निकलवा लिए थे। शायद अस्थाई
रूप में आई मैम को अपनी नौकरी की चिंता थी। अभी उन्होंने अपने पैर स्कूल में ठीक
से नहीं जमाए थे। ये भी हो सकता है बाहरी परीक्षक शायद कुछ प्रभावी रहा हो जहाँ
वो अपनी कमी नहीं दिखाना चाहती हो।
परेशानी को सोच यही ख़याल आया कि ज़िंदगी में हम इसी तरह के दो लोगों से घिरे
हुए हैं, एक वो जो ग़लती नहीं होने पर भी आप पर ग़लती थोपते हैं या ये कहिए कि वो
भी आप की ग़लतियों में शामिल होते हैं पर किसी और के सामने सारा दोष आप पर ही मढ़ देते
हैं। क्या करे ऐसे लोगों का? हर जगह तो राधा मैम नहीं है, पर ऐसे लोगों के साथ
रहकर ख़ुद को परेशान करना भी ठीक नहीं हैं। ऐसा नहीं है मुझे अपनी कमियाँ नहीं
मालूम है। अच्छी तरह से वाक़िफ़ हूँ अपनी ग़लतियों और कमियों से, ऊपर से परिवार
वाले भी कुछ ऐसे ही मिले हैं जो कोई मौक़ा ग़लती बताने का नहीं चूकते। आलोचना
अच्छी भी लगती है सुधरने का मौक़ा मिलता है जानकर। पर ये निंदा करनेवाले नहीं
चाहिए अब। निंदा कई बार आत्म-विश्वास तोड़ देती है। सही तरीक़े से की आलोचना
आपमें एक आत्म-विश्वास जगाती है। राधा मैम चाहती तो डाँट से अपनी बात शुरू कर
सकती थी, क्या है, तुम्हें इतना भी नहीं आता? पर उन्होंने पहले एक विश्वास जगाया और
फिर अपनी बात की और इस विश्वास ने मेरे अंदर एक आत्म-विश्वास पैदा किया।
हमारे आस-पास बहुत से लोग हमारी अस्थाई मैम की तरह के हैं जिन्हें अपने ऊपर ही
विश्वास नहीं है, वो अपने हुनर से ही आश्वस्त नहीं हैं। उन्हें हर समय ख़ुद को ही
साबित करना होता है। उन्हें हर हाल में अपनी नौकरी बचानी है और इसके लिए वो किसी
भी हद तक जा सकते है। वो हर राह हर मोड़ पर किसी को नीचा दिखा ख़ुद तो ऊँचा बताते
हैं क्यूँकि ख़ुद की ऊँचाई का पैमाना उनके पास नहीं है। पहले ऐसे लोगों पर बहुत
ग़ुस्सा आता था। पर अब जब ख़ुद का ग़ुस्सा शांत है तो दया ही आ रही है। पर झूठ
कहूँगी कि ऐसे लोगों का असर नहीं होता है, एक घटना के कारन पूरा एक हफ़्ता ख़राब
किया। उबरने में अच्छी ख़ासी परेशानियों का सामना करना पड़ा। पर एक बात अच्छी तरह
जान गई कि अगर ऐसे लोग आपके आस पास हैं तो उनसे बचें। कैसे? जितना सम्भव हो उतना।
पूरी तरह तो असम्भव ही होगा।
अगर सोशल मीडिया में हैं ऐसे लोग जो आपको नीचा दिखाने का मौक़ा नहीं चूकते तो
ब्लॉक करे उन्हें। ब्लॉक करना कोई ग़लत बात नहीं है। मुझे भी आत्मग्लानि होती थी
जब किसी को ब्लॉक करती थी, अब नहीं है। आलोचना कीजिए पर एक सभ्य तरीक़े से। अपना
मज़ाक़ ख़ुद ही बनाती हूँ पर हँसी-मज़ाक़ और उपहास में अंतर है। एक हद के बाद किसी
को अपना उपहास करने की इजाज़त नहीं दूँगी क्यूँकि इससे मुझपर असर पड़ता है। आपको
बहुत परेशानी है आप अपने घर ख़ुश और मैं अपने घर ख़ुश। पर आपकी और आपके घर की
परेशानी को मैं नहीं झेलने वाली, वो आपको मुबारक।
सच्चे नेता, सच्चे लीडर वो हैं जो हर स्थिति में आपको ये यक़ीन दिलाते हैं की
आप कर सके हैं। उन्हें अपने पे विश्वास है इसलिए वो आप पर भी विश्वास करते हैं और उनके
विश्वास से आपमें भी एक आत्म-विश्वास आ जाता है और जब आपमें आत्म-विश्वास आ जाता
है तो आप हर मुक़ाम हासिल कर सकते हैं क्यूँकि आत्म-विश्वास जीत की पहली ही नहीं सबसे ज़रूरी मंज़िल है।
निंदक नियरे रखिये, आँगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय
कबीर जी ने जब ये लिखा था तो शायद उन्हें आज-कल के लोगों का उतना ज्ञान नहीं
था। या शायद उनका निंदक से अभिप्राय आलोचक का होगा। पर माफ़ कीजिएगा कबीर जी, आज के
निंदक अपनी भी गंदगी आपके ही आँगन में धो लेते हैं और ये मानते भी नहीं कि वो ही
लाए थे। जहाँ तक सम्भव हो सकेगा मैं उन्हें अपने से दूर रखूँगी, चाहे मुझे उन्हें
ब्लॉक ही क्यूँ न करना पड़े। क्यूँकि मेरी ज़िंदगी का एक ही मंत्र है वो है ख़ुश
रहना और दूसरों को भी जितना बन पड़े ख़ुश रखना। परेशान हो कर मैं कुछ नहीं कर पाती,ज़िंदगी
वैसे ही टेन्शन से भरी पड़ी है, मुझे बिना बात की और टेन्शन नहीं चाहिए, न ऑफ़िस
में न घर पर।
रमण को मैंने कहा था, ‘अच्छा है मुझे अड-हाक मैम का नाम याद नहीं हैं। ऐसी
मैम का नाम याद भी नहीं रखना चाहिए। पर अब राधा मैम को सीरीयस्ली खोजती हूँ, सुना
है वो किसी दिल्ली के ही केंद्रीय विद्यालय में प्रिन्सिपल है, उनसे मिलकर उन्हें
ये घटना याद दिलानी है।’
बहुत खुब,कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो गई ��
ReplyDeleteशुक्रिया .... अच्छी यादें हैं तो ठीक है याद रहनी चाहिए 😀😀🙏
Deleteआपकी ये यादे पढने के साथ उसका काल्पनिक इमेज भी दीमाग मे बन रहा था ,दजिनदगी की कुछ घटना ना चाहते हुए भी याद रह ही जाती हैैं|
ReplyDeleteशुक्रिया अगर मेरी लेखनी ऐसा करने में सक्षम है तो ये मेरी सफलता है .. यादें इसी का दूसरा नाम ज़िंदगी है
Deleteपुनः धन्यवाद
I went through your blog write up just now! A very exhaustive detailed account of what we discussed! Almost verbatim replica👍👍🙏🏻A well etched out release to your pent up emotions !Well done👍👍👏👏
ReplyDeleteRaman's comment from whatsapp.. poor guy he is unable to post on blog.. so just a helping hand.... anyway Raman keep tying you wil succeed for sure.. कोशिश करने वालों की हार नहीं होती 🤣🤣🤣🤣🤣
A very exhaustive detailed account of the discussion! Almost verbatim replica👍👍🙏🏻A well etched out expression of the memories that probably have weighed heavily on your mind👍👍👏👏Bingo!
ReplyDeleteBravo!!!! . finally Raman has managed to do .. cheers... great !!! Thanks a lot but not deleting my previous comment.. let it be .. it will remind you of the struggle you had while posting this.. but welcome Raman to the blogging world 🙏🙏😊😊😊
DeleteHappy nostalgia :)
ReplyDeleteThanks a lot Lalit ji .. more so for going through the write up.. 😊😊
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