Sunday, 30 April 2017

अगर ये आँखें रूह को कुछ देख पातीं

अगर ये आँखें रूह को कुछ देख पातीं
दुनिया में सिर्फ़ ख़ूबसूरती ही नज़र आती

ये रूह भी समुन्दर की तरह फैला हुआ
अंदरूनी बातें ऊपर से नज़र कब आती

ये कैसे अजनबी से ताल्लुक़ मेरे मौला
अनजान आँखें, रूह कहे वो जन्मों का साथी

जिस्म की ख़्वाहिशों से रूह मर गई
ऐसी बातें आज भी हमें समझ नहीं आतीं

इस ज़िंदगी की चाहतों का क्या करें
काश रूह ओढ़ कर ये गुज़र पाती

जिस्म के अंदर ही तो रूह है बसा
तो क्यूँ लगे वो इतनी भूखी प्यासी

इंसान उस दिन सही मायने में है मरता
जब रूह उसकी पूरी तरह ख़ामोश हो जाती 


1 comment:


  1. इंसान उस दिन सही मायने में है मरता
    जब रूह उसकी पूरी तरह ख़ामोश हो जाती

    बहुत खुब 👏👏🙏

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