अगर ये आँखें रूह को कुछ देख पातीं
दुनिया में सिर्फ़ ख़ूबसूरती ही नज़र आती
ये रूह भी समुन्दर की तरह फैला हुआ
अंदरूनी बातें ऊपर से नज़र कब आती
ये कैसे अजनबी से ताल्लुक़ मेरे मौला
अनजान आँखें, रूह कहे वो जन्मों का साथी
जिस्म की ख़्वाहिशों से रूह मर गई
ऐसी बातें आज भी हमें समझ नहीं आतीं
इस ज़िंदगी की चाहतों का क्या करें
काश रूह ओढ़ कर ये गुज़र पाती
जिस्म के अंदर ही तो रूह है बसा
तो क्यूँ लगे वो इतनी भूखी प्यासी
इंसान उस दिन सही मायने में है मरता
जब रूह उसकी पूरी तरह ख़ामोश हो
जाती
ReplyDeleteइंसान उस दिन सही मायने में है मरता
जब रूह उसकी पूरी तरह ख़ामोश हो जाती
बहुत खुब 👏👏🙏