एक दिवाली ऐसी भी चाहिए
जहाँ राम वनवास नहीं किसी को अपना कर घर आए
जहाँ सीता बिना अग्निपरीक्षा अपनाई जाये
जहाँ रावण सीता के
विचारों का सम्मान करे
जहाँ विभीषण के सत्य के
मार्ग का न कोई अपमान करे
जहाँ राम और रावण एक दूसरें
के काम आयें
जहाँ हम राम रावण दोनों के लिए दीये जलायें
जहाँ हम राम रावण दोनों के लिए दीये जलायें
एक दिवाली ऐसी भी चाहिए
एक दिवाली ऐसी भी चाहिए
जहाँ सूर्पणखा को
लक्ष्मण बातों से समझा पाए
जहाँ सूर्पणखा रावण
को नारी सम्मान सिखाए
जहाँ दशरथ पुत्र वियोग
में मारा ना जाए
जहाँ पिता पुत्र को
गद्दी छोड़ना भी बतलाए
जहाँ कोई किसी के वचन
से बंध न जाए
जहाँ दशरथ भी पुत्र के
स्वागत में खड़ा हो पाए
एक दिवाली ऐसी भी चाहिए
एक दिवाली ऐसी भी चाहिए
जहाँ अच्छाई और बुराई
का ना पाठ हो
जहाँ सबको एक दूसरे पर
विश्वास हो
जहाँ खुल कर बोलने की आज़ादी
हो
जहाँ बातों में सच पूछने की बेबाक़ी हो
जहाँ इंसान दूसरों की
नज़रों से न तौला जाए
जहाँ सही भी ग़लत के
लिए कुछ दीये जलाए
एक दिवाली ऐसी भी चाहिए
एक दिवाली ऐसी भी चाहिए
जहाँ सच ग़लत को राह
दिखाए
जहाँ ग़लती करने से न
कोई घबरायें
जहाँ ग़लती को भी हम
हँस कर गले लगायें
जहाँ ग़लती की सीख हम
महफ़िल को सुनायें
जहाँ सुंदर-असुंदर में
कोई भेद न रह पाए
जहाँ हम सबके लिए दिल
से दीये जलायें
एक दिवाली ऐसी भी चाहिए
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