Tuesday, 29 November 2016

हाँथों की लकीरों को बदल पाना मुश्किल था

हाँथों की लकीरों को बदल पाना मुश्किल था
शाम थी ज़िंदगी कि सुबह बनाना मुश्किल था।

बंदगी में खुदा की खुदा से हम कितना चाहते  
पर खुदा को ख़ुद के दिल में बसाना मुश्किल था।

ख़्वाब-ख़्वाहिशों की हर हक़ीक़त से हम वाक़िफ़ हैं
पर ख़्वाहिशों की आज भी गर्दन दबाना मुश्किल था।

ये जूनून-ए-दीद उल्फ़त की मजबूरी है
पर वक़्त को इस बात पर मनाना मुश्किल था।

हम जानते हैं इश्क़-ए-बुत अब बिगड़ गई
पर दिल को ये सच समझाना मुश्किल था।

आपकी बेबाक़ सहाफ़त को तहे दिल से सलाम
पर सहाफ़त की बातों से वतन बचाना मुश्किल था।  



3 comments:

  1. Great & very mature thoughts Madam !

    ReplyDelete
  2. शाम - ऐ - ज़िन्दगी में ये परिवर्तन लाना ज़रूरी है
    नयी ख्वाहिशों को दिल में बसाना ज़रूरी है
    ज़रूरी नहीं की हर मुराद खुदा से ही मांगे
    अपने पसीने के कतरों को भी आज़माना ज़रूरी है


    ReplyDelete
    Replies
    1. Kya baat hai makkad ji ....ab hum sab ek official blog banate hain

      Delete