हाँथों की लकीरों को बदल पाना मुश्किल था
शाम थी ज़िंदगी कि सुबह बनाना मुश्किल था।
बंदगी में खुदा की खुदा से हम कितना चाहते
पर खुदा को ख़ुद के दिल
में बसाना मुश्किल था।
ख़्वाब-ख़्वाहिशों की
हर हक़ीक़त से हम वाक़िफ़ हैं
पर ख़्वाहिशों की आज भी
गर्दन दबाना मुश्किल था।
ये जूनून-ए-दीद उल्फ़त
की मजबूरी है
पर वक़्त को इस बात पर मनाना मुश्किल था।
हम जानते हैं
इश्क़-ए-बुत अब बिगड़ गई
पर दिल को ये सच समझाना मुश्किल था।
आपकी बेबाक़ सहाफ़त को
तहे दिल से सलाम
पर सहाफ़त की बातों से
वतन बचाना मुश्किल था।
Great & very mature thoughts Madam !
ReplyDeleteशाम - ऐ - ज़िन्दगी में ये परिवर्तन लाना ज़रूरी है
ReplyDeleteनयी ख्वाहिशों को दिल में बसाना ज़रूरी है
ज़रूरी नहीं की हर मुराद खुदा से ही मांगे
अपने पसीने के कतरों को भी आज़माना ज़रूरी है
Kya baat hai makkad ji ....ab hum sab ek official blog banate hain
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