Sunday, 27 November 2016

शहर मेरा कुछ दिवानों सा है

शहर मेरा कुछ दिवानों सा है
कुछ नादान कुछ सयानों सा है।

इसकी भीड़ में तुम खो जाओ कहीं
ख़ुद का ख़याल भी यहाँ कुछ भुलाने सा है।

इसकी ख़ामोशी में भी शोर है छिपा
हर वक़्त बोलता ये कुछ परवानों सा है।

दुश्मन भी यहाँ दोस्त बन कर ही मिला
और दोस्तों का हाल कुछ बेग़ानों सा है।

ऊँची मीनार देख कुछ धोखा खा गए
घर यहाँ पर छोटे छोटे अफ़सानों सा है।

कभी ख़ुद से रूठता कभी ख़ुद से टूटता
आदत मेरे शहर की कुछ इंसानों सा है।

किसी को सब दे दिया किसी से सब ले लिया
फ़ितरत इसका भी तो कुछ भगवानो सा है

ज़िंदगी इसकी ‘हाइ’ और ‘बाय’ में सिमट गई
हर मुलाक़ात यहाँ व्हाट्सप्प के फ़सानो सा है। 






2 comments:

  1. sabse khubsoorat pankti --- दुश्मन भी यहाँ दोस्त बन कर ही मिला
    और दोस्तों का हाल कुछ बेग़ानों सा है।

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  2. शुक्रिया। मुझे भी ये पसंद है पर सबसे अंतिम वाला मुझे ज़्यादा पसंद आया। हम मिलते है hi और विदा हुए bye के साथ। मुलाक़ात भी बस चलते चलते और विद भी कुछ इस तरह। मुलाक़ात भी बनावटी ही लगती है जिसपर यक़ीक ही नहीं। वैसे ही जैसे WhatsApp के मेसिज।

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