Saturday, 26 November 2016

ज़िंदगी तेरी कोई शर्त न मानी जाएगी

ज़िंदगी ले हार मान ली मैंने
तेरी कोई गाँठ न मुझसे खोली जाएगी
पर बहुत हुआ तेरा बात बात पर रूठना
अब मनाने की कोई शर्त न मानी जाएगी

वो उलझते हुए तेरे कुछ रिश्ते
वो टूटे हुए घर के कोने के क़िस्से
वो काजल से भी काली तेरी रातें
गुज़री हुई न गुज़रने वाली वो बातें
ये और न मुझसे सम्भाली जाएगी
ज़िंदगी ले हार मान ली मैंने……………………..

वो बेड़ियों में जकड़ी तेरी सुबह
वो अंधेरे की क़ैद में तेरी शाम
टूटा हुआ न टूटने की आशा में वो खड़ा
वो बिखरा हुआ बँधने के लिए परेशान पड़ा
ये उम्मीद और कितनी नाउम्मीदी दे जाएगी 
ज़िंदगी ले हार मान ली मैंने……………………..

बोझ से बोझिल तेरी हर सांसें
हर राह हर मोड़ पर तूने ग़म बाँटे
बेबसी के भी तूने सौदे हैं किए
ख़ुशी के ख़रीदारी में क्यूँ ग़म मिला दिए
अब बात और उधारी पर न टाली जाएगी
ज़िंदगी ले हार मान ली मैंने……………………..

न होता मैं तो क्या होता
न होता मैं तो तू क्या खोता
होंठ न मुस्कुराते पर दिल भी न रोता
ये जो होता तो क्या वो भी न होता
तेरा होना न होने से भी क्यूँ न तौली जाएगी
ज़िंदगी ले हार मान ली मैंने……………………..







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