Monday, 28 November 2016

बारिश कुछ इस क़दर भिगो गई

बारिश कुछ इस क़दर भिगो गई
हर सामान को ख़ुद में डुबो गई।

चाँद और तारों की तमन्ना कब थी
पर ये आँधी तिनको को भी संग ले गई

खोमशी का लबों पर हर वक़्त पहर पड़ा है
पर मुस्कुराने की इसकी आदत क्यूँ खो गई

धूप इस चौखट पर आएगी कभी
सामने घरों में दीवारें जो खड़ी हो गई

हाथ अब किसी से मिलाए तो कैसे भला
आखों को सच बोलने की आदत जो हो गई।




2 comments:

  1. Baarish kuch is kadar bhigo gayi
    zindagi ka path naya sikha gayi
    Boond boond se milkar bane dariya
    bikhrav se ekatra hone ke laabh bata gayi

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    1. बहुत ही सुंदर .. आप भी ब्लॉग पर शुरू हो जाएँ

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