वो रास्ते लौटाएँगे जो ख़ुद हैं खो चुके
मंज़िलो की चाहत में ये भी हैं रो चुके
वक़्त के नाइंसाफ़ियों की बात क्या करें
कुछ मौत की बुज़दिली को भी ढो चुकेरौशनी की ख़्वाहिश कोई किस से करे
सूरज ही जब साज़िशों के बीज बो चुके
ख़्वाब हमारे लिए देखना है गुनाह
इंसान नहीं हम खुदा को टोह चुके
दुआ है उन गलियों को मिले ख़ुशियाँ ता-उम्र
जिन गलियों में जाने की हम उम्मीद खो चुके
मैल जिस्म को आज भी जकड़े है पड़ा
क्या करे सकड़ों बार हम इन्हें धो चुके
ख़्वाब की तासीर कोई कैसे करे भला
सच झूठ से लड़ कर आज फिर सो चुके
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