Wednesday, 9 January 2019

धोखे में जीते रहने का और कितना प्रयास करूँ

धोखे में जीते रहने का और कितना प्रयास करूँ
टूटे को तोड़ने का बोलो कितना मैं अभ्यास करूँ

मन है मेरा शीशे का पत्थर हैं सबके हाथों में
किसको अपनी बात बताऊँ किसपर मैं विश्वास करूँ

वादों की ही लाश उठाये सब आये हैं आंगन में
उम्मीदों का तुम ही बोलो कैसे शिलान्यास करूँ

सपनों के धरौंदों को हर रोज तो रौंदा जाता है
खुशियों की चौखट पर फिर कैसे आवास करूँ

संसार को समझने के लिए संसार का त्याग ज़रूरी है
कैसे ऐसी बातों को अपनाऊं कैसे मैं सन्यास धरूँ





No comments:

Post a Comment