किसी की बात कहाँ खुद से धोखा खाया है
ये सच है हमने खुद से खुद को जलाया है
हवाओं की शाज़िशों में हर कोई गिरफ्तार
पर इन शाखों ने पत्तों को खुद भी गिराया है
ताजमहल में भी हमें मकबरा ही दिखा
कुछ सोच हमने अपने लिए तो सजाया है
खुदा मान जिसके सामने हम आज हैं खड़े
कभी इन पत्थरों को हमने पैरों से हटाया है
क्या हासिल हुआ हमे चाँद पे पहुंच के
जब बचपन को हमने भूखे सुलाया है
ये सच है हमने खुद से खुद को जलाया है
हवाओं की शाज़िशों में हर कोई गिरफ्तार
पर इन शाखों ने पत्तों को खुद भी गिराया है
ताजमहल में भी हमें मकबरा ही दिखा
कुछ सोच हमने अपने लिए तो सजाया है
खुदा मान जिसके सामने हम आज हैं खड़े
कभी इन पत्थरों को हमने पैरों से हटाया है
क्या हासिल हुआ हमे चाँद पे पहुंच के
जब बचपन को हमने भूखे सुलाया है
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