सुना है ख्वाबों में रहने से नींद आती नहीं
क्या इस लिए रात हमें जगाती रही
इश्क़ भी एहसासों का एक गलीचा है
ख्वाब-बेबसी एक दूसरे को समझाती रही
धरती को कोई अब ये कैसे समझाए
आसमान देख क्यूँ उम्मीदें लगाती रही
वक्त के लिफ़ाफ़े पे कुछ तो लिखा होगा
ग़लतफ़हमी इस आस में दिन बिताती रही
आफताब नहीं महताब की बातें करे
अँधेरे में जो रौशनी बरपाती रही
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