Saturday, 21 December 2019

सुना है ख्वाबों में रहने से नींद आती नहीं

सुना है ख्वाबों में रहने से नींद आती नहीं 
क्या इस लिए रात हमें जगाती रही  

इश्क़ भी एहसासों का एक गलीचा है 
ख्वाब-बेबसी एक दूसरे को समझाती रही

धरती को कोई अब ये कैसे समझाए    
आसमान देख क्यूँ उम्मीदें लगाती रही

वक्त के लिफ़ाफ़े पे कुछ तो लिखा होगा
ग़लतफ़हमी इस आस में दिन बिताती रही

आफताब नहीं महताब की बातें करे
अँधेरे में जो रौशनी बरपाती रही 





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