Saturday, 1 July 2017

हर तरफ़ कोई टूटता हर तरफ़ कोई तोड़ता नज़र आ रहा

हर तरफ़ कोई टूटता हर तरफ़ कोई तोड़ता नज़र आ रहा
जिसे देखिए कुछ समझ रहा जिसे देखिए कुछ समझा रहा

भेड़ और भेड़िये की पहचान अब एक सी
हर कोई धोखा दे रहा हर कोई धोखा खा रहा

कोई अब किसी को आज़मायें तो कैसे भला
कहीं दुश्मन दोस्त बन मिला कहीं दोस्त दुश्मन नज़र आ रहा

दायरों की रौशनी अब दिखती ही नहीं
आदमी ख़ुद में सिमट रहा आदमी ख़ुद को फैला रहा

वक़्त की पहचान अब और न हो पाएगी
वही वक़्त निशां बना रहा वही वक़्त निशां मिटा रहा

झूठ और सच का फ़ैसला अब ना हो पाएगा
कभी झूठ सच्चा सा लगे कभी सच झूठ से घबरा रहा 

बस ये कह कर हम चुप हो जाएँगे
हर शख़्स कुछ दिखा रहा हर शख़्स कुछ छुपा रहा 




4 comments:

  1. Very well written ! It proves there are no real or reel friends on #Social Media . Better to have one real friend in life than thousands of followers on Twitter & Face Book ! 😐😐😐

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  2. Thanks a ton... well because I thought I didn't make sense.... and well some followers too needed to comment on blog na .. I mean from social media ������

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