Saturday, 8 July 2017

घरों की बातें महफ़िल में सुनाई नहीं जाती

घरों की बातें महफ़िल में सुनाई नहीं जाती 
हर बात लोगों को सरे आम बताई नहीं जाती 

मकान बना कर भी हमने देख लिया 
घर ईंट-पत्थरों से बसाई नहीं जाती 

जाते हुए न मूड के देखा उसने एक बार 
और हमसे एक निशानी हटाई नहीं जाती

चलिए अब ज़िंदगी को एक नया मोड़ दे
ज़िंदगी ख़्वाबों-ख़यालों से बिताई नहीं जाती 

बहुत हुए जीने के वो किताबी फ़लसफ़े 
किताबी बोझ ज़िंदगी से उठाई नहीं जाती 



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