Friday, 7 July 2017

समझने-समझाने की जंग कितनी बड़ी है

समझने-समझाने की जंग कितनी बड़ी है
दिल के अहसासों पर लफ़्ज़ों की बेबसी हैं

कभी लगे परेशानियों से हम अब हार जाएँगे
कभी लगे ज़िंदगी इनके दम पर ही चल रही है

कितनी वाही-तबाही दिल-दिमाग़ में हम बिठाएँ
बस एक कूड़ेदान की जिस्म में आज भी कमी है

बहुत ज़रूरी था कल वो सब बोल देना
जो आज बोलने की बात ही नहीं रही है

बहुत ज़ख़्म खाएँ हैं हमने इंसानों से
इसलिए कुछ दूरी सबसे बना रखी है

न इंतिज़ार न तलाश इन आँखों को
कैसे कहें ये बेजान सी क्यूँ लगी है

या तो आप अंदर आएँ या बाहर जाएँ 
दरवाज़े पे खड़े होने की इजाज़त नहीं है  




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