Saturday, 14 March 2020

थक चुकी हूँ ज़िन्दगी तेरे बे-वक्त के सवालों से

थक चुकी हूँ ज़िन्दगी तेरे बे-वक्त के सवालों से
सच कहती हूँ मेरा नाता नहीं उल्झे हुए जवाबों से

कहानियां वो भी परियों की अब मुझे सताती है
मर जाता है हर राक्षस, ये झूठ वो भी किताबों से

भींज कर मुट्ठी क्यूँ खड़े हुए हैं आप
वक्त का रिश्ता नहीं ख्यालों- ख्वाबों से 

ख़ाली लिफाफों को आज भी क्यूँ संजोया करती हूँ
बहुत राज छुपे हैं इसमें बहुत उम्मीद बंद लिफाफों से

वो जलती रही, चीखती रही चिल्लाती रही 
लोग समझें क्या रौशनी निकली है पटाखों से

वक्त रुक कर भी हर वक्त चलता रहता है
ये बात फिर बहार आई जेल की सलाखों से

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