अपनी ही बातों में आता नहीं वो
ख़ुद पे भी भरोसा जताता नहीं वो
ख़ुद पे भी भरोसा जताता नहीं वो
ख़ुद को उसने कितना बदल लिया
बात बात पर मुस्कुराता नहीं वो
ज़िंदगी उसकी टूटे
पंखों पे खड़ी है
कैसे कहें आसमान देख
ललचाता नहीं वो
यादों ने भी उससे
दुश्मनी है निभाई
बिन उसके दो क़दम चल पाता नहीं वो
बिन उसके दो क़दम चल पाता नहीं वो
अपनी ही परछाईं से
ख़ौफ़ खाए
अंधेरे में रौशनी चाहता नहीं
वो
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