कुछ तारीखें कुछ तहरीरे
हटाए नहीं हटती
वक़्त के साये में ये
छिपाए नहीं छिपती
ये ज़ख़्म दिल से कैसे यूँ
हीं मिट जाएँगे
निशानी दीवार की जब
मिटाए नहीं मिटती
रोकर, लड़कर, हर कोशिश
कर देख लिया
क़िस्मत किसी सूरत में
बनाए नहीं बनती
हथेली आज कल जैसी ही ख़ाली
है
हवा भी इसमें टिकाए नहीं
टिकती
अब लगता है मैं टूटने ही वाला हूँ
टहनी मेरी अब झुकाए नहीं झुकती
टहनी मेरी अब झुकाए नहीं झुकती
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