ये जिन्दगी रोज हमें कुछ सीख दे जाती है
इसकी हर तस्वीर हमें कुछ समझाती है
आज रचित की इस तस्वीर ने भी कुछ याद दिलाया
इसने कुछ समय के लिए ही सही मेरा बचपन लौटाया
रेत पर बचपन में हमने भी खूब घरौंदे बनाए हैं
और हर बार समुद्र की लहरों ने उसे मिटाए हैं
फिर भी मैं खूब घरौंदे किनारों पर बनाती थी।
कितनी कोशिश करती पर लहरें उन्हें ले ही जाती थी
समुद्र के किनारे हम बच्चे एक खेल और खेला करते थे
समुद्री रेतों को अपनी हथेली में ख़ूब भरते थे
पर जब भी समुद्री लहरें किनारों पर आती
रेतों को हमारी हथेलियों से लेकर ही जाती
कई बार रेत को लेकर जोर से मुट्ठी बंद किया
फिर भी समुद्री लहरों ने अपना रेत ले ही लिया
थक कर एक बार अपनी मुट्ठी मैंने खोल दी
समुद्री लहरों को अपनी सारी बेबसी बोल दी
पर ये क्या मेरी खुली हथेली पर रेत पडा था
जाते हुए लहरों ने मेरी हथेली पर रेत धरा था
शायद लहरों ने मुझे एक पैगाम दिया था
बंद मुट्ठी पर कुछ
बात कहा था
बंद करोगी जिन्दगी की मुट्ठी तो
चाहतो के रेत को किस्मत की लहर ले कर जाएगी
खोलोगी नहीं जिन्दगी की ये हथेली तो
कैसे तुम्हारी हथेली पर चाहत की रेत बिखर पाएगी।
पर तुम्हें जितना मिला उतना सराहना होगा
इसको इसके मूल रूप में ही अपनाना होगा
फिर तुम्हें चारों तरफ आशाओं की समुद्र नजर आएगी
और लहरें जिन्दगी की हथेली में खुशियाँ बरसाएँगी

Masoom khayalon ko jagaati karti hui ye bahut hi sundar kavita likhi hai aapne. Main aksar sochta huun ki jo bhi kuchch mila hai mujhe is jivan safar men ye sirf pariNam (result) hai mere karmon ke. Kai baar ye pariNam tuurant hi pasand aata hai to kai baar bahut dinon ke baad :)
ReplyDeleteबहुत ही उलझा हुआ ज़िंदगी का हर एक फ़लसफ़ा है
Deleteकभी लगता ख़ुद का किया है कभी लगता खुदा का दिया है।
Man ke sachche vicharon ko bahut sundar kalam mili hai...jeeva ki gehrai ko bayan karti yeh kavita apki sarvottam kavitaon mein shumar rahegi...
ReplyDeleteशुक्रिया मक्कर जी। आज सबको जवव दे रही हूँ
Deleteमक्कड जी। correcting it.....
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