Thursday, 1 September 2016

शब हमने ख़्वाबों में ही है गुज़ारी

शब हमने ख़्वाबों में ही है गुज़ारी  
सहर हुई तो ज़िंदगी जीने की दुस्वारी

हमने हर बात अपनी ही है कही
वो क्या कहें ये उनकी समझदारी

अपनी ही क़ैद से हम रिहाई पायें तो कैसे  
क़ातिल हम क़त्ल हमारा सज़ा देने की हमारी ही ज़िम्मेदारी

कई रातों के मुसाफ़िर जाए भी तो कहाँ
एक लम्बी नींद की इस जंगल में कैसे करे तैयारी

हर सबूतों का जवाब अब ख़ामोशी ही दे पाएगी
हमारे सर हमारे क़ातिल को बचाने की भी ज़िम्मेदारी 


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