शब हमने ख़्वाबों में ही है गुज़ारी
सहर हुई तो ज़िंदगी जीने की दुस्वारी
हमने हर बात अपनी ही है कही
वो क्या कहें ये उनकी समझदारी
अपनी ही क़ैद से हम रिहाई पायें तो कैसे
क़ातिल हम क़त्ल हमारा सज़ा देने की हमारी ही ज़िम्मेदारी
कई रातों के मुसाफ़िर जाए भी तो कहाँ
एक लम्बी नींद की इस जंगल में कैसे करे तैयारी
हर सबूतों का जवाब अब ख़ामोशी ही दे पाएगी
हमारे सर हमारे क़ातिल को बचाने की भी ज़िम्मेदारी
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