माना कोहरा बहुत घना है
पर कोहरे ने कब कहाँ चलना मना है।
देखने पर कोहरा हमें डराता है।
चारों तरफ ये अपना विशाल रूप ही दर्शाता है।
पर जैसे जैसे हम आगे चलते जाते है।
ये पीछे हटता ही जाता है।
ये हमारे लिए खुद ही रास्ता बनाता है।
तो आगे बढना कम कब मना है।
माना कोहरा..........................
कोहरे में मंजिल कहीं खो सी जाती।
चारों तरफ एक धूंधली उजाली छाती।
पर जैसे हम कदम बढाते है।
कोहरा छटता ही जाता है।
सामने से घटता ही जाता है।
तो एक कदम उठाना कब मना है।
माना कोहरा..........................
पर कोहरा हमें दौड़ने पर टोकता है।
हाँ ये हमें भागने से रोकता है।
ये हमें दुर्घटना से भी अवगत कराता है।
हाँ ये हमें धीरे चलना भी सीखाता है।
जिन्दगी में सम्भल के चले ये भी जताता है।
तो सम्भल के चलना कब मना है।
माना कोहरा..........................
जिन्दगी की परेशानियों का भी कोहरा बहुत घना है।
पर परेशानियों से लडना कब मना है।
परेशानियों को हटाने के लिए एक कदम तो बढाना होगा।
हाँ पर सम्भल कर हर कदम उठाना होगा।
परेशानियों का कोहरा पीछे हटता ही जाएगा।
हमारे चलने से थोड़ा घटता ही जाएगा।
पर कोहरे की तरह परेशानियों से घबराना मना है।
माना कोहरा..........................

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