From my Facebook January 7. 2015.......
This is slightly long poem....but a true story...people at Merchant's Chamber of Uttar Pradesh are quite aware of it....so please bare with it....
वो बूढ़ा बाबा मेरे आँफिस के आगे था खड़ा।
बेबस लाचार पर लगता क्यों था स्वाभिमान से भरा।
वो मेरे आने से बिल्कुल नहीं घबराता था।
लोगों को खड़ा देखकर भी वो मेरे लिए खड़ा नहीं हो पाता था।
गार्ड की माने तो उसे लोगों को इज्ज़त देना नहीं भाता था।
बेबस लाचार पर लगता क्यों था स्वाभिमान से भरा।
वो मेरे आने से बिल्कुल नहीं घबराता था।
लोगों को खड़ा देखकर भी वो मेरे लिए खड़ा नहीं हो पाता था।
गार्ड की माने तो उसे लोगों को इज्ज़त देना नहीं भाता था।
पर कुछ तो थी बात उसमें की निगाहें उस पर पड़ ही जाती।
न चाहते हुए भी नज़रें उस पर गड़ ही जाती।
सोचा बेचारा बहुत ही बेबस और लाचार है।
घर से निकाला हुआ बेघर और बेकार है।
न चाहते हुए भी नज़रें उस पर गड़ ही जाती।
सोचा बेचारा बहुत ही बेबस और लाचार है।
घर से निकाला हुआ बेघर और बेकार है।
गार्ड ने कहाँ मैडम इसे यहाँ से दूर हटा देते हैं।
कुछ नुकसान करें इससे पहले भगा देते हैं।
पर ऐसा करना क्या सही में ठीक होगा?
उसने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा।
कुछ नुकसान करें इससे पहले भगा देते हैं।
पर ऐसा करना क्या सही में ठीक होगा?
उसने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा।
पर कुछ बात तो थी जो कहीं अटक रही थी।
उसके कपड़ों से झलकती गरीबी कहीं खटक रही थी।
मेरे आँफिस के आगे वो बद्सूरती के रूप में खड़ा था।
मेरे साथ-साथ वो कई और लोगों की आखों में भी गड़ा था।
उसके कपड़ों से झलकती गरीबी कहीं खटक रही थी।
मेरे आँफिस के आगे वो बद्सूरती के रूप में खड़ा था।
मेरे साथ-साथ वो कई और लोगों की आखों में भी गड़ा था।
सोचा कोई और बोले क्यों मैं ही न कुछ बोल दूँ।
क्यों न उसके लिए कोई और रास्ता ही खोल दूँ।
टिफिन में लाई दो रोटी सब्जी उसके लिए निकाल लाई।
रोटी के बहाने ही सही अपनी सहानुभूति भी प्रकट कर पाई।
क्यों न उसके लिए कोई और रास्ता ही खोल दूँ।
टिफिन में लाई दो रोटी सब्जी उसके लिए निकाल लाई।
रोटी के बहाने ही सही अपनी सहानुभूति भी प्रकट कर पाई।
बोली बाबा भुखे हो इसे खा लो।
पर हो सके तो एक बात मुझे बता दो।
क्यों तुम दो दिन से यहाँ ऐसे पड़े हो।
कहाँ है घर तुम्हारा तुम यहाँ ऐसे क्यों खड़े हो।
पर हो सके तो एक बात मुझे बता दो।
क्यों तुम दो दिन से यहाँ ऐसे पड़े हो।
कहाँ है घर तुम्हारा तुम यहाँ ऐसे क्यों खड़े हो।
भावहीन चेहरे से उसने मुझे ऐसे देखा।
जैसे उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।
या मालुम नहीं शायद वो मुझे कुछ बता रहा था।
हो सकता है वो मेरी हरकत पर अन्दर से मुस्कुरा रहा था।
जैसे उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।
या मालुम नहीं शायद वो मुझे कुछ बता रहा था।
हो सकता है वो मेरी हरकत पर अन्दर से मुस्कुरा रहा था।
उसके न चाहते हुए भी रोटी उसके हाथ में रख दी।
और साथ साथ एक सीख भी गढ दी।
बाबा तुम मुझे बताना तुम्हें कहाँ है जाना।
अगर पता दो तो तुम्हें तुम्हारे घर से जोड़ दूगी।
चाहो तो तूम्हारी जिन्दगी वृधाश्रम की तरफ मोड़ दूगी।
और साथ साथ एक सीख भी गढ दी।
बाबा तुम मुझे बताना तुम्हें कहाँ है जाना।
अगर पता दो तो तुम्हें तुम्हारे घर से जोड़ दूगी।
चाहो तो तूम्हारी जिन्दगी वृधाश्रम की तरफ मोड़ दूगी।
उसने फिर अनसुना किया मेरी बात को।
सोचा कुछ देर में समझ जाएगा।
कुछ देर मे ही सही मेरी बातों को जरूर सराहेगा।
यही सोच कर अपने कमरे में गई।
और अपने आँफिस के कामों में उलझ पड़ी।
सोचा कुछ देर में समझ जाएगा।
कुछ देर मे ही सही मेरी बातों को जरूर सराहेगा।
यही सोच कर अपने कमरे में गई।
और अपने आँफिस के कामों में उलझ पड़ी।
पर जब घर जाने का वक्त आया।
तो उस बूढ़े के खयाल ने फिर से सताया।
सोचा फिर उसके पास जाती हूँ।
फिर उसको अपनी बात समझातीं हूँ
तो उस बूढ़े के खयाल ने फिर से सताया।
सोचा फिर उसके पास जाती हूँ।
फिर उसको अपनी बात समझातीं हूँ
पर वो जगह तो पूरी तरह से खाली पड़ा था।
वहाँ किसी बूढ़े का नामोनिशां नहीं धरा था
गार्ड गलत था।
इतनी इज्ज़त तो जिन्दगी में किसी ने नहीं दी।
बिना कहे मेरी समस्या जो उसने हल कर दी।
वहाँ किसी बूढ़े का नामोनिशां नहीं धरा था
गार्ड गलत था।
इतनी इज्ज़त तो जिन्दगी में किसी ने नहीं दी।
बिना कहे मेरी समस्या जो उसने हल कर दी।
पर एक कोने पर मेरी दी दो रोटी पड़ी थी।
जो धूप के कारण पूरी तरह अकड़े खड़ी थी।
क्यों लग रहा था वो रोटी मुझ पर हँस रही थी।
मेरे बड़बोलेपन को मानो पूरी तरह से डस रही थी।
जो धूप के कारण पूरी तरह अकड़े खड़ी थी।
क्यों लग रहा था वो रोटी मुझ पर हँस रही थी।
मेरे बड़बोलेपन को मानो पूरी तरह से डस रही थी।
क्यों वो बाबा मुझे अब हर जगह नज़र आ रहा था।
ऐसा लगा वो आफिस की दिवारों से चिल्ला रहा था।
लो मैंने तुम्हारी उलझन पूरी तरह हल कर दी।
पर क्या तुम अब भी सुलझ पाओगी।।
अपने मन के अन्दर की इस बद्सूरती को तुम कैसे और कहाँ छुपाओगी।
ऐसा लगा वो आफिस की दिवारों से चिल्ला रहा था।
लो मैंने तुम्हारी उलझन पूरी तरह हल कर दी।
पर क्या तुम अब भी सुलझ पाओगी।।
अपने मन के अन्दर की इस बद्सूरती को तुम कैसे और कहाँ छुपाओगी।
Wanted to sketch the face of the old man but ended up drawing the darker side of myself... the irony of life....when you point something to others... you come to know about yourself too...

BEAUTIFUL Heart touching.
ReplyDeleteThanks a lot
DeleteBEAUTIFUL Heart touching.
ReplyDelete