Friday, 24 March 2017

आर जे रौनक़ किम्वदंती कोई हास्यास्पद शब्द नहीं है

कल सुबह लगभग सवा दस बजे जब ऑफ़िस के कुछ पास पहुँच गई तो गोपाल को कहा, अरे गाने तो लगा दो, आज तो तुमने रेडीयो चलाया ही नहीं। जवाब था, आप फ़ोन पर किसी से बात कर रही थीं इसलिए बंद कर दिया था।

किसी को फ़ोन पर बात करते सुन वो रेडीयो ख़ुद-ब-ख़ुद बंद कर देता है। कहा, कोई बात नहीं, चला दो एक गाना तो सुन ही लूँगी। गोपाल ने गाड़ी का एफ-एम रेडीयो चालू किया ९३.५ स्टेशन था। एक आवाज़ को पहचान गई, आर.जे. रौनक़ की थी, पर दूसरी आवाज़ नहीं पहचान पाई।

रेडीयो जब चालू हुआ तो वो दूसरी आवाज़ ही कुछ बोल रही थी और बोलने में उसने कहा, नहीं ये किम्वदन्ती है।  रौनक़ जी ने ये किम्वदन्ती शब्द को ऐसे पकड़ा जैसे कोई नया चुटकुला हाथ लगा गया है, और उनका परिहास शुरू, किम्वदन्ती? दूसरी आवाज़ किम्वदन्ती शब्द, आर.जे. रौनक़ के मुँह से सुनकर कुछ झेंप-सी गई।

‘हाँ किम्वदन्ती’

‘किम्वदन्ती, किम्वदन्ती’ रौनक़ उर्फ़ बऊआ जी रटे जा रहे थे और दूसरी आवाज़ की आवाज़ में झेंप साफ़ नज़र आ रही थी। बस यही क्रम जारी था और जैसा अक्सर होता है, एफ-एम का अपना ब्रेक और कुछ देर बाद मेरा ऑफ़िस। सो गाड़ी से उतर गई जान ना सकी ये दूसरी आवाज़ किसकी थी और न ही इस कार्यक्रम की ही कोई जानकारी ले सकी। गाड़ी में अपना ही गाना ज़्यादा सुनती हूँ, पेन ड्राइव में लोड होता है, एफ-एम कभी-कभार ही बजता है। एक डेढ़ घंटे के रास्ते में भी एफ-एम से तीन-चार गाने ही सुन पाते हैं और पूरे टाइम उनका विज्ञापन का ब्रेक। और सच कहूँ तो मुझे आर जे की बक-बक भी नहीं पसंद, गाना सुनाना हैं तो सुनाओ। तुम्हारी बक-बक के लिए नहीं, गाना सुनने के लिए एफ-एम चलाया है।  

पर कल एफ-एम चलाया था। पर रौनक़ महाशय को सुन कर बहुत ही अजीब लगा, ये क्या तरीक़ा है? बात करने और मज़ाक़ बनाने के लिए, माना रौनक़ जी जाने जाते होंगे या हैं। कभी-कभी उन्हें सुना भी है, आर जे रौनक़ का बऊआ, मुझे पसंद है और मुझसे ज़्यादा मेरे पतिदेव को। शायद इसका एक कारण ये भी है की मैं बिहार से हूँ और बिहार में ये नाम बहुत ही प्रचलित है। मेरे अपने घर में यानी अपने रिश्तेदारी में ही बऊआ है। मेरे ममेरे भाई का घर का नाम बऊआ ही है। घर में सबसे छोटा था इसलिए नाम बऊआ ही रह गया। अभी एक अच्छी कम्पनी में ज़िम्मेदार पोस्ट पर है पर सबके लिए आज भी वो बऊआ ही बना हुआ है।

पर कल बऊआ जी का मज़ाक़ मज़ाक़ नहीं उपहास लगा, वो भी हिंदी भाषा पर। इतना मुश्किल शब्द नहीं है ‘किम्वदन्ती’ रौनक़ जी। हाँ, हो सकता है आपने नहीं सुना हो। कई प्रचलित शब्दों से भी कई बार हम माहौल के कारण अनजान रहते हैं। मेरी बातों पर यक़ीन नहीं होता हो तो रोड पर चले जाइए और ग़रीब दिखने जैसे किसी भी व्यक्ति से इस शब्द का मतलब पूछियेगा। दावे के साथ कह सकती हूँ दस में से तो पाँच तो आपको ज़रूर जवाब दे ही  देंगे।

चलिए संदर्भ बदलते हैं रौनक़ जी, मानिए दूसरा वक़्ता अंग्रेज़ी में बोल रहा होता तो आप या शायद मैं भी क्या करती? उस शब्द को ध्यान से सुनते और उससे पूछने की भी हिम्मत नहीं करते की इसका क्या मतलब है। उस शब्द को मौक़ा देख शब्दकोश में खोजते और फिर उसका इस्तेमाल ख़ुद भी करते।  

अंग्रेज़ी की अज्ञानता दिखाने में हमें शर्म आती हैअंग्रेज़ी ज्ञानियों की भाषा जो ठहरीपर अपने अनुभव से कह सकती हूँ कि हम हिंदुस्तानी अंग्रेज़ों से भी अच्छी अंग्रेज़ी जानने लगे हैंअंगेज़ी के ऐसे-ऐसे शब्द को सीख रहे हैं जो कई बार अंग्रेज़ों को भी हैरान कर देते हैं। हाँ, वो शब्द शब्दकोश में ज़रूर हैं अगर इसी रफ़्तार से हम चलते रहेंगे वो दिन दूर नहीं जब हम सब शेक्सपीयर की अंग्रेज़ी से भी अच्छी अंग्रेज़ी बोलने लगेंगे

पर हिंदी का ये उपहास वो भी हमारे हिंदी में ही कार्यक्रम करने वाले आर जे के द्वारा। कुछ अच्छा नहीं लगा। माना आपलोगों को कामचलाऊ हिंदी ही बोलनी है, आपका टर्गेट ग्रुप भी शायद ऊँच मध्य-वर्ग और मध्य-वर्ग ही है। पर अगर हम अपनी भाषा का आदर नहीं करेंगे तो कौन करेगा। हमारी संस्कृति दूसरों का आदर करना सिखाती है पर अपनों का निरादर करना भी नहीं सिखाती। हिंदी हमारी माँ है, अपनी सगी माँ और अंग्रेज़ी हमारे दोस्त की माँ है। अपनी माँ को इज़्ज़त दिए बिना दोस्त की माँ का इज़्ज़त करना बेमानी है, और अगर आप अपनी माँ का इज़्ज़त नहीं करेंगे, तो कोई भी नहीं करेगा। लोग देखा-देखी इज़्ज़त भी देते हैं और न करना और करना सीख  भी जाते हैं।

अगर ये हाल रहा तो लगता है धीरे-धीरे हिंदी की हालत भी संस्कृत जैसी ही हो जाएगी, या एक पूरी तरह से नई हिंदी बने जिसमें सिर्फ़ वाक्य का आधार हिंदी हो और सारे के सारे शब्द अंग्रेज़ी के। हम क्यूँ इतने अच्छे-अच्छे शब्दों को खोते जा रहे हैं। हिंदी भी कहीं संस्कृत की तरह सिर्फ़ किताबों में पाई जाने वाली भाषा और शब्द बन कर न रह जाए और कुछ दिनो में स्कूल भी संस्कृत की तरह हिंदी को हटाने की सिफ़ारिश करे क्यूँकि विदेशी भाषा बच्चे सिखना चाहते हैं। बच्चों की मजबूरियाँ हैं गलाकाट और गलाघोट प्रतियोगिता और स्पर्धा जो है ज़िंदगी जीने के लिए। ऊपर से शिक्षकों  और माता-पिता का दबाव। पर हैरानी बड़ों को देख ज़्यादा होती है, अगर कोई सरकार संस्कृत स्कूल में लाना भी जाहे तो बड़े भी उनके विरोध में उमड़ पड़ते है। जैसे अपनी ही भाषा से वो मुक्ति चाहते हो। अगर हम अपनी भाषाओं को नहीं बचाएँगे तो कोई बाहर से इस बचाने के लिए नहीं आएगा और अगर आ भी गया तो मेहरबानी उसकी, पर भाषा हमारी है, धरोहर हमारी है, तो बचाना भी हमारा ही धर्म है।

मानती हूँ कई बार सही में बहुत मुश्किल शब्दों का सामना करना पड़ता है पर वो सारे शब्द मुश्किल हैं जिन्हें हम नहीं जानते हो, हिंदी हो या अंग्रेज़ी। एक बार जान लीजिएगा तो आसान हो जाएगा और इस्तेमाल करने से बहुत ही आसान। दो-तीन साल पहले एक बार दसवीं के बच्चों की भीड़ में थी, बोर्ड का परीक्षा थी और हिंदी की परीक्षा दे कर बच्चे बाहर आए थे। बच्चे दिल्ली के बिरला विद्या निकेतन में पढ़ते थे। उनकी बातें सुन रही थी, अरे वो मुहावरा था न, ‘दाल में कुछ काला होना’ उसका क्या मतलब था, पूरे ग्रुप को ये मुश्किल लग रहा था। लगा इतना आसान मुहावरा बच्चों को क्यूँ मुश्किल लग रहा है। हिंदी मैंने भी सिर्फ़ दसवीं तक ही पढ़ी है पर ये तो रोज़मर्रा की बोली में बोला जाने वाला मुहावरा है। फिर लगा मैं ग़लत सोच रही हूँ। ये बच्चे जिस माहौल से आते हैं वहाँ हिंदी वैसी नहीं बोली जाती जैसा मैं सोच रही हूँ, उनका स्कूल और घर भी बदल चुका है। उनके लिए ये मुहावरा मुश्किल कर दिया है उनके माहौल ने।

पर कुछ दिन पहले अपनी छोटी बहन के छः साल के बच्चे के मुँह से अच्छी हिंदी सुन कर हैरान थी। पत्र, ख़ुफ़िया कुछ ऐसे शब्द बोल रहा था जो आदतन आज कल के अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे नहीं बोलते। लगा मेरी बहन इसके साथ शायद हिंदी को लेकर मेहनत कर रही है, फिर उससे पूछ ही लिया। जवाब सुन कर हैरान थी, अरे नहीं दीदी आजकल ये छोटा भीम बहुत देखता है ये उसी का नतीजा है। बच्चों के कार्टून चैनल ने भी अब शहरी हिंदी बोलना शुरू कर दिया है। ख़ुशी हुई इस भीड़ में भी छोटा  भीम है जो बच्चों को सही हिंदी सिखा रहा है। तब से सोच ही रही हूँ कि छोटा भीम देखूँगी पर समय के अभाव के कारण देख ही नहीं पाई। बच्चे क्या बड़े भी भाषा को सुन-सुन कर पकड़ते हैं। जो सुनते हैं वही बोलना सीखते हैं।

आपको ये इसलिए बोल रही हूँ कि आप ऐसी जगह पर हैं जहाँ लोग आपको सुनते हैं। अच्छा लगता, जो शब्द आपको नहीं मालूम था वो आप बोलने वाले से पूछ लेते उस शब्द का क्या मतलब था, और अपने सुनने वालों को भी बता देते, कहते देखिए इस जनाब ने मुझे आज हिंदी का एक शब्द सिखाया है। उपहास करके नहीं एक आदर के साथ, तो शायद वो भाषा जिसकी आप रोटी खा रहे हैं और अपनी बात लोगों तक पहुँचा रहे हैं, का कुछ भला हो जाता। आपके वो सुनने वाले जिन्हें इस शब्द का मतलब नहीं मालूम है वो भी इसका मतलब जान जाते। कुछ हँसी मज़ाक़ के साथ ज्ञान मिल जाए तो क्या बुरा है।

लिखने को मजबूर तब हुई जब कल शाम को भी घर जाते वक़्त १०४.८ एफ-एम चल रहा था, प्रोग्राम का नाम इश्क़ कमीने। ट्विटर पर मस्त थी, तभी सुना की किसी महिला ने कुछ बोला और इस प्रोग्राम के आर जे डॉक्टर वी सी ने कहा, कुछ देर में हमें ये हिंदी का व्याकरण भी  सिखा देती। कमीने, लोंडे ऐसे शब्दों का हम बिना लिहाज़ किए कितना प्रयोग करते रहते हैं अपने कार्यक्रमों में, लेकिन अच्छी हिंदी बोलना क्यूँ उपहास बन जाता है? हिंदी का व्याकरण सही में मुश्किल है। दो साल से कोशिश कर रही हूँ, पर आज भी लिखने-बोलने और ख़ास कर जल्दी-जल्दी लिखने-बोलने में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग की बहुत ग़लतियाँ करती हूँ। पर हिंदी नहीं आना गर्व की बात कब से हो गई है और अच्छी अंग्रेज़ी बोलना ज्ञान। जबकि सच्चाई ये भी है कि  शहर और गाँव की हिंदी आज भी अलग हैं। हाँ, अब टीवी के कारण गाँव में भी लोग अंग्रेज़ी के शब्दों का अत्याधिक इस्तेमाल करने लगे हैं पर जिस हिंदी को हम आम हिंदी समझते हैं वो आज भी शहरी मध्य-वर्ग या ऊँच मध्य-वर्ग की ही हिंदी है, हर उस आम कहे जाने वाले लोगों की नहीं।

आज फ़्रान्स अपनी फ़्रेंच को सुधारने के लिए लगातार कुछ फ़्रेंच शब्दों का आविष्कार कर रहा है, उसे अंग्रेज़ी से परहेज़ है। हमें अंग्रेज़ी से परहेज़ नहीं है, होनी भी नहीं जाहिए, पर कई बार लगता है क्यूँ हम हिंदी ने नए नए शब्द नहीं बनाते। अभी तक हम कॉलेज में पढ़ने और पढ़ाने के लिए ढंग की विज्ञान की किताब तक नहीं बना पाए और इतने प्यारे प्यारे शब्द जो हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत और समय खपा कर निकाले और बनाए उसे भी हम खोते जा रहे हैं। बहुत ख़तरनाक है ये, आर जे रौनक़ आप हिंदी का नहीं, अपने अस्तित्व का उपहास कर रहे हैं।

इसी उम्मीद के साथ लिखना बंद कर रही हूँ कि अगली बार अगर आप हिंदी के किसी शब्द को सुने जिसका मतलब आपको नहीं मालूम हो तो उसका उपहास करने की बजाये ख़ुद भी जाने और लोगों को भी उसका मतलब बताएँ। हिंदी के प्रति कुछ कर्तव्य हम सबका है, ये हमारी पहचान है हमारे हिंदुस्तानी होने की भी पहचान है।


9 comments:

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  2. आर जे की क्लास लगा दी आपने। यह भी एक किंव्दंति ही है

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    1. नहीं इतनी मेरी औक़ात नहीं है.. बस जो लगा लिख दिया.. अगर पढ़ कर कुछ भी असर होगा तो सोचूँगी मेरा लिखना बर्बाद नहीं हुआ ... मैं भी तो सीख ही रही हूँ .. पर सही में कई बार शर्म और कई बार जलन होती है जब किसी को बहुत अच्छी हिंदी बोलते और लिखते देखती हूँ .. मन करता है काश मैं भी इतना ही अच्छा लिख और बोल पाती....

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  4. 'किंवदंती' से सम्बद्ध आपका लेख पढ़ा . प्रसन्नता हुई कि हिंदी शब्द के प्रयोग के लिए आपके भीतर चिंता है. होनी भी चाहिए. हमारी अपनी भाषा है. अपनी बोली है . अपने अज्ञान को हम भाषा की दुरूहता कहकर उससे दूर होते हैं और बस यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह कठिन शब्द है. ऐसे ही प्रसंगों को ध्यान में रखते हुए मेरे गुरु प्रवर-आचार्य निशांतकेतु जी कहा करते हैं कि कोई भी शब्द कठिन या सरल नहीं होता है, अपितु परिचित या अपरिचित होता है. जैसे कि यदि हमें कहीं जाना हो और हमें मार्ग की जानकारी नहीं है तो हम दूसरे राहगीरों से उस जगह जाने का मार्ग पूछते हैं और अपने गंतव्य पर पहुँच जाते हैं. हम इस स्थिति में किसी से पूछने में गुरेज नहीं करते हैं. फिर अपनी भाषा के साथ ही हम क्यों सौतेला व्यवहार करते हैं ? अपने देश, अपनी मिट्टी और अपनी भाषा पर हर हिंदुस्तानी को गर्व करना होगा . अपनी भाषा सीखनी भी होगी.
    मुझे अच्छा लगा कि आप प्रायः अंग्रेजी में काम करती हैं , पर हिंदी में लिखती हैं और हिंदी के लिए बोलती हैं. ऐसे अवसरों पर हमें अपनी आवाज उठानी ही होगी . खासकर तब जब मीडिया के क्षेत्र में ऐसी बात होगी. एक हिंदी नामित अखबार भी भाषा भ्रष्ट हो गया है. आधुनिकता और अंग्रेजी प्रचलन के नाम पर ऐसी छूट नहीं लेनी चाहिए. यह स्वमंथन का विषय है. आपको बधाई देता हूँ.

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    1. क्या बात है अशोक जी ...तहे दिल से शुक्रिया... अंग्रेज़ी मेरी ज़रूरत है और हिंदी मेरा प्यार.. मुझे दोनों की ज़रूरत है पर किसी एक की क़ीमत पर नहीं .. हम इस तरह अपने ही शब्दों को खोते जा रहे हैं... किंवदंती मेरा जाना पहचाना शब्द था.. इसलिए और भी हैरानी हुई.. मुझे बुरा तब लगता है जहाँ लोग ख़ुद को ज्ञानी साबित करने के लिए अंग्रेज़ी का प्रोयोग करते है.... हम क्यूँ भूलते जा रहे हैं कि ये एक भाषा है ...और उपहास तो क़तई बर्दाश्त नहीं होता.. आपको नहीं मालूम तो मत बोलिए पर कोई बोलता है तो उसे प्रोत्साहित कीजिए..

      पुनः एक बार आपका धन्यवाद

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  5. मुझे हिंदी बोलने का गर्व है ! But as pointed out by our distinguished Blogger , learning English is a necessity in our offices , with so many of our software engineers , doctors working abroad . Parents in USA , where I stayed for almost 6 months at a stretch are willing to pay $ 40 per hour for their kids as young as 5 years to learn #Hindi !

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  6. बुरा न मानो बोली है 😀

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  7. बुरा न मानो बोली है 😀

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