Monday, 8 January 2018

तोहफ़ा नहीं व्यवहार बोलता है

तोहफ़ा नहीं व्यवहार बोलता है पैसा नहीं सदाचार बोलता है बेशक़ीमती सामान ख़रीद के देख लिया मुफ़्त में पाया छोटा सा उपहार बोलता है उम्मीदों के कुछ तोहफ़े हम भी चाहें क़िस्मत का मारा वो लाचार बोलता है

हर दिन ख़ुद में ही एक तोहफ़ा है
ख़ूनी ख़बर वाला अख़बार बोलता है

हम मर कर भी अब तक कैसे जिन्दा है
शायद बुजुर्गों की दुआओं का संसार बोलता है

वक्त ने क़त्ल किया वो कातिल कहलायेगा
टी वी का मारा हर समाचार बोलता है

बस हाथ बढ़ाने का ही तो फासला था
गलतफहमी में खड़ा दीवार बोलता है

कितना तुम मुझ को दे पाओगे
बाजार का हर खरीदार बोलता है

खुशियां इस पल में ही बसी है
दिल में बजता तार बोलता है






हर अमीर का कोट साफ़ रहेगा

हर अमीर का कोट साफ़ रहेगा बस ग़रीबों के पास अपराध रहेगा एसी के कमरों में बदबू छिप जाएगी रोटी के बस्तो में चीख़ता ये पाप रहेगा वो भूख की राह पे फिर लड़खड़ाएगा
अमीरी के पास हर औसाफ रहेगा

पैरहन ही सच की पहचान बनेगी
दिल कब सच्चाई का नाप रहेगा

जम्हूरियत के भुलावे में मत आइये
वक्त हमेशा कुर्सी के ही पास रहेगा
बातें आप चाहे जितनी बना लीजिए पर सच है अमीरों के साथ इंसाफ़ रहेगा




Friday, 22 December 2017

हर पत्थर में एक आग होती है

हर पत्थर में एक आग होती है 
हर आवाज़ में एक बात होती है 

अँधियों में जो खिड़कियों की धड़कन है 
वो बेबसी बेकरारी के साथ होती है 

अपनी बेकरारी को हम कैसे पहचाने 
लगता है किसी की हमसे बात होती है 

कुछ तो गलत किया है हमने 
बेकरारी यूँ ही नहीं पास होती है 

कुछ पाने की चाहत या टूटने का सिला 
बेकरारी हर हाल में आबाद होती है

Wednesday, 20 December 2017

इंसान है हम हँसे हैं तो रोये भी तो हैं

इंसान है हम हँसे हैं तो रोये भी तो हैं
दर्द में चीखे हैं दर्द में सोये भी तो हैं 

ज़िन्दगी को कभी गले से हमने लगाया 
ज़िन्दगी के बोझ को कभी ढोये भी तो हैं 

कभी खुद को हमने खुद ही है सताया 
कभी खुद की चाहत में खुद खोये भी तो हैं 

ख्वाहिशें हैं बे-इंतिहा, सपने आसमान के 
पर ज़िन्दगी में हकीकत के बीज बोये भी तो हैं

अपनी ही ज़िन्दगी में आग हमने है लगाई 
अपनी ही लाश को हम ढोये भी तो हैं 





Sunday, 17 December 2017

कुछ तारीखें कुछ तहरीरे हटाए नहीं हटती

कुछ तारीखें कुछ तहरीरे हटाए नहीं हटती
वक़्त के साये में ये छिपाए नहीं छिपती

ये ज़ख़्म दिल से कैसे यूँ हीं मिट जाएँगे
निशानी दीवार की जब मिटाए नहीं मिटती

रोकर, लड़कर, हर कोशिश कर देख लिया
क़िस्मत किसी सूरत में बनाए नहीं बनती

हथेली आज कल जैसी ही ख़ाली है
हवा भी इसमें टिकाए नहीं टिकती

अब लगता है मैं टूटने ही वाला हूँ
टहनी मेरी अब झुकाए नहीं झुकती

  

अपनी ही बातों में आता नहीं वो

अपनी ही बातों में आता नहीं वो
ख़ुद पे भी भरोसा जताता नहीं वो

ख़ुद को उसने कितना बदल लिया
बात बात पर मुस्कुराता नहीं वो

ज़िंदगी उसकी टूटे पंखों पे खड़ी है
कैसे कहें आसमान देख ललचाता नहीं वो

यादों ने भी उससे दुश्मनी है निभाई
बिन उसके दो क़दम चल पाता नहीं वो

अपनी ही परछाईं से ख़ौफ़ खाए
अंधेरे में रौशनी चाहता नहीं वो


Thursday, 16 November 2017

रिश्ता

हर रिश्ते में अपनी परेशानी है
हर रिश्ते की अपनी रवानी है 

कुछ रिश्तों में ही अटक गए 
कुछ रिश्तों में ही लटक गए 

कई रिश्तों से बर्बाद हुए 
कई रिश्तों से आबाद हुए 

कुछ रिश्तों से ही संभल गए 
कुछ रिश्तों से ही बिखर गए

कभी रिश्तों ने हमे मनाया है 
कभी रिश्तों ने हमे रुलाया है 

कुछ रिश्तों में झीना-झपटी भी 
कुछ रिश्तों में मरहम पट्टी भी 

कुछ रिश्तों ने बंधन भी खोले हैं 
कुछ रिश्ते कई बार हमें तोड़े हैं 

कुछ रिश्ते यूँ ही पीछे छूट गए 
कुछ रिश्ते बेमतलब रूठ गए 

कई रिश्तों में हम आज भी उलझे हैं 
कई रिश्ते आज भी तो अनसुलझे हैं 

रिश्तों की रोज इक नई कहानी है
रिश्तों की बात पर वो ही पुरानी है 

जो आबाद हुआ वो ही तो रिश्ता था 
जो बर्बाद हुआ बस इक किस्सा था